Monday, February 23, 2015

विचार-1 ( व्यथा और संवाद )

आस्थाओं का कोई धर्म नहीं होता और संस्कार प्रकृति विहीन है होता।हर मजहब इन्सानी है और हर इन्सान में प्रकृति।
मेरी व्यथा अब इन्सान होने मात्र से है। काश इश्वर भी इस रंगमंच पर इंसानों को भी नेपथ्य से आवाज दे पाता।
अब आंशुओं में भी मुझे व्यथा का अभिसार या चरम सुख की ख़ुशी नहीं दिखती। यह तो अब निरंतर निर्झर नदी के माफिक शाश्वत और गुंजायमान है। जिसका शोर इन्सान के मुख से और निरंतरता आँखों से कहीं भी परिलक्षित हो जाती है इस धरा पर ,और बहूत आसानी से आपको अपने मानव विकाश के अग्रशिलता पर खीस दिलाती है और आपको भयाक्रांत कर देती है।
मैंने आज कुछ ऐसी घटना देख ली जो मुझे झकझोर कर रख दी है,मेरा अंतर्मन और आंतरिक मस्तिस्क का साहचर्य विलोपित है। मैं अजीब अवस्था में खुद को पा रहा हूँ ।
आज कुछ लोग एक बेहद वृद्ध महिला को पीट रहे थे , बिलकुल बुरी तरेह क्युकी वो किसी के दुकान से एक समोसा चुराते हुए पकड़ी गयी थी। जबतक लोग उस व्यक्ति तक पहुचते रोक थाम करने की पहल करते , उस वृद्धा को उन व्यक्तियों ने जमींदोज कर दिया था,वो जमीं पर कराह रही थी। बाद में हम जैसे कुछ भीड़ उन्हें अस्पताल तक छोड कर आए। और अस्पताल में मैंने देखा जो इस्थिति वो और भी हृदय विदारक था। उफ्फ्फ..भगवान ही मालिक था वहां का...

इश्वर ने इस संसार में न जाने कैसे कैसे आलेख लिख रखें हैं और नाटक रच रखा है। मुझे तो अब इश्वर के इस रंगमंच पे पात्रों की पात्रता बिलकुल ही असहज और अविवेकी लग रहा है अब। अब इश्वर जो भी तर्क दे कर इसे कहानी की सत्यता या अपने नाटक के पात्रों का पक्ष रखें मुझे स्वीकार्य नहीं होगा। ये कैसा किस्सा और आलेख है ,और कैसा निर्देशन है जहाँ पात्र को अपने संवाद और अभिनय का कोई समझ ही नहीं है और ना ही नेपथ्य से उसे अपनी रंगमंच की पात्रता का मार्गदर्शन कर रहा है।
हे इश्वर आपके इस रंगमंच पर बिलकुल ही अस्तव्यस्तता है,आपके पात्रों को आपके दिए गए निर्देशों की कोई परवाह नहीं है,सभी अपने मर्ज़ी से अपने पात्रता को सिद्ध करने के होर में है और आप फिर भी चुप हैं। खेद है मुझे ये कहते हुए की जो भी सही अभिनेता हैं आपके रंगमंच पर वो आज मूक हैं और आपके चहेते धर्म निर्देशक आज कल समाज से अलग हो बाजार पर ध्यान केन्द्रित कर के बैठे हैं। और उधर आप भी पता नहीं किस लीला में व्यस्त हो।
कुछ जल्दी करो वरना ये सारा का सारा आपका रंगमंच एक व्यथित कोलाहल या निःशब्द चुप्पी में तब्दील होने वाली है।
मेरी ये मानसिक अवस्था स्वाभाविक है क्यूंकि चिंता अब चिंतन में तब्दील होने लगी है और मुझे मेरी प्राकृतिक स्वभाव को सामाजिक और व्यवहारिक पटल पर परिवर्तन को सूचित और इंगित कर रहा है। मै अब परिवर्तन हूँ और क्रिया अब परिवर्तित है। जिंदगी की इस तीक्ष्ण घुमाव पर इस्थिर गति एक सुरक्षित प्रतिक्रिया हो चुकी है, और अब हम सब को इसका प्रतिकारक बनने की जरूरत है।
धन्यवाद