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Sunday, September 3, 2017

"सामाजिक मनोविज्ञान और हम"

लो कर लो बात, फिर से तुमने आवाज उठाई तो, हँस पड़े लोग,। और तुम लोगो की सोच कर चुप लगा बैठे मायूस हो कर।।
शिक्षा जो तुमने ली, जो किस्से जो कहानियाँ पढ़ी ,जिसे पढ़ा कर लोगो ने सीख लेने को कहा, अगर वही बात जीवन में करने की कोशिस की तो लो हो गया ,तहजीब की ऐसी की तैसी !!
ये सामाजिक संस्कार,ये संस्कृति , ये ठगा सा व्यवहारिक व्यवस्थाएं जकड़ी हुई है, मानसिक विपन्नता से, एक दूसरे के उपहास से और तानों से। मैं जब भी आँखे मिच कर देखता हूँ तो बस एक ढोंग और खोकली सी चादर ताने तम्बू दिखता है, जो न तो ठीक से धुप से बचाती है और न बारिश से।
अजीब सा किस्सा है, कुछ न करो तो उपहास और कुछ कर दिखाने का जज्बा दिखाओ तो निचे दिखाने वाली हँसी। कैसे चल पायेगा ऐसे !! बस आँखे मूंद कर जपते रहो उनका नाम ,पूजते रहो उन्हें, पढ़ते रहो बस उन्हें किताबों में और चार पंक्तियों की भावार्थ,उपसंघार और अलंकारों की चासनी में उन्हें लपेट कर परीक्षा में उत्तीर्ण होते रहो, यही नियति है तुम्हारी।। अब नियति की भी क्या है, परिवेश देख कर गिरगिटिया रंग बदल लेता है। अजीब पेशोपेश है इस सांसारिक, सांस्कृतिक ,सामाजिक जीवन में। यदि इसे देख कर घबराओ तो फट्टू और लड़ने की जिजवषा दिखाओ तो ओवर स्मार्ट !! हद है यार..सोचो कुछ नया तो खयाली पुलाव और यूँ ही आदेश वाहक बने रहो तो पिछलग्गू !!
यहाँ पुरषोत्तम राम, श्री कृष्ण और त्रिलोकी शिव के सामने सर झुकाने की अनुमति है, उनके जीवन ,उनके चरित्र को जीवन में उतारनेे की नहीं। यदि आपने ऐसा करने की भूल भी की तो सारे सामाजिक ताना बाना बिगाड़ने की आपने पहल की है। यदि श्री राम के चरित्र से आपने स्त्री , पत्नी के सम्मान और उसके विचारों को तहजीब दी तो आप पत्निव्रता, यदि नहीं दी तो आप व्याभिचारी। आपने कृष्ण की तरह प्रेम शब्द को जीवंत करने की कोशिश की तो छिछोड़ा, सच मानों तो आप बस कृष्ण की लीलाओं का आनन्द ले तो सकते हो, उन्हें सुनकर आह्लादित तो हो सकते हो ,लेकिन उन्हें जीवन में नहीं उतार सकते। यहाँ  यदि सर झुकाये रहो तो व्यवहारिक और सर उठा कर चलो तो घमंडी ।।
यहाँ न तो जियो और ना जीने दो।। फिर तो आपकी सामाजिक जिंदगी  उत्कृष्ट है।। और कोई भला मानुस इन सबसे लड़ के कुछ कर जाये तो उसे बस पढ़ते रहो पाठ्य पुष्तक में। लेकिन कुछ करो मत अकर्मण्य बने रहो, आँखे मूंदे रहो बस।
यदि किसी की मदद करने का समय आये तो आप "दूसरे के काम में टांग नही अड़ाते ", और खुद समस्या में हैं तो पूरी दुनिया "स्वार्थी".
यदि आप हमारे समाज के इन व्यवस्थाओं और मानवी संकल्पनाओं को देखेंगे,पढ़ेंगे और सोचेंगे तो आप क्या पाते हैं अपने इर्द गिर्द ? सिर्फ नकारात्मक माहौल और कुछ नहीं। यदि आप कुछ और नजदीक जा कर देखेंगे तो पाएंगे की ये दुबिधा इसीलिए है की हमारी समाज की परिधि "मैं" में सिमटी पड़ी है," मैं "से " हम "तक का सफ़र कोई तय ही नहीं कर पा रहा । हर कोई एक दूसरे को देख कर अपनी इस्थिति को आँकता है बस यही है सब कुछ का जड़ !! लोग ये कहेंगे, लोग वो कहेंगे.....पता नहीं लोग क्या कहेंगे ... और लोग हैं कौन? आप भी तो हैं उनमे, या आप उन लोगों में नहीं हैं? आप उन्ही में से एक हैं, इसीलिए आप भी लोगों से भयभीत है , और आपको लोगो की वाहियात सोचों की फ़िक्र है, अन्यथा किसी को मुश्किल में आपने हाल तक नहीं पूछा कभी, और आज आप को समाज और लोगों की फिकर है।।
हाहाहाहा अजीब हास्यास्पद इस्थिति है, और इस इस्थिति में परिस्थितियों में आप बस गौण हैं, अंग्रेजी के साइलेंट वर्ड की तरह, जहाँ आपकी उपस्थिति तो है लेकिन कोई महत्व नहीं।। बस आप हैं , ये मान कर चलिए । और बस चलते रहिये बिना सोचे समझे भेड़ चाल में, फिर आप सभ्य भी हैं,सामाजिक भी और व्यवहारिक भी।
मैं बस इतना बोलना चाहता हूँ की सोचिये जरा और परिवर्तन बनिए, परिवर्तित बाद में कीजियेगा , शायद आपकी पहल स्वतः परिवर्तन लाये।।

आपका
भास्कर