व्यंग जब जिन्दगी से हो तो साला सारी व्यख्यान और ज्ञान कहीं घुसर जाता है। आज साला हमको भी पिछवाड़े के आयने ने अपनी अनुवांशिक हिंदी में कुछ लिखने को मजबूर किया।और हमने खुद को ही लिखना पसंद किया,अपनी जिंदगी को।
हम आज भी अपने अतीत को ही जीने की कशमकश में लगे हैं और पूरी दुनिया भविष्य को।
हमको आज भी याद है की हम भी साला कभी कुछ बन जाने का सपना देखते थे, हमलोग भी कभी राज कैंपस के पोखरा के सीढियों पर बैठ कर अपने ज्ञान की रागनी गाया करते थे और फिर घर आकर खा पि कर सो जाते थे। आलम ये था की हम कभी भी किसी से खुद को पीछे नहीं समझते थे, थे साला डेढ़ फुट के और बख्थोती हम से रूकती नहीं थी। बस एक ही वाक्य याद है आज भी जिन्दगी के की "वचनम् किं दरिद्रता" और हम साला इसी बात को चरितार्थ करने हेतु पुरे दिन फुटानी करते फिरते। हमको लगता था की दुनिया के सारी लड़कियां हम पे ही मरती है और हम साला लिलिपुट होते हुए भी कोई अमिताभ बच्चन से कम थोरे न थे।
एक मित्र था विवेक जो साला हमेशा "मारबे ..मारबे" का रट लगाये रहता,एक बी2 जो साला उठता तो बगले खुजाता था मगर साला स्टाइल में अपने आप को हॉलीवुड स्टार समझता था,रही बात सुभाष की तो वो बिना पूछे ही ज्ञान बांटते फिरता था।विक्की,अजीत ,बजरंग और आनंद सभी हमारी तरह रेस के घोड़े बनने की होर में थे। मगर हमारी दोस्ती उस समय निर्दोष और निश्छल थी और हम साला ओवर स्मार्ट।
आज ना तो कोई दोस्त है और ना हम किसी के शागिर्द। साला हर कोई अपने गांड में रखे attitude को सुबह बिना निकाले घूम रहें हैं,हम भी उन्ही में से शामिल हैं।और अपने आपको श्रेष्ठ मान कर गुम हैं कहीं किसी होर में,मारा मारी में।
और साला हम इधर पिछड़ गए उनसे रेस में तो बस पीछे ही रह गए। अब ना तो कोई पीछे से आवाज देने वाला है ," रे भास्करिया" न ही साला कोई अब ये कहता है की घंटा लिखता है तुम, ना कोई हमारे बकवास पर ये कहता है की, भाई अल्हुआ लेबे।
इस बात का दुख आज भी नहीं है की हम पीछे रह गए मगर आज भी राजनगर और स्कूल की बातें यादआती है तो बस यही लगता है की वो जिन्हें सीढियों पे भी दौर लगाना था वो लगा चुके,और उचाईयों की छत पर खड़े हो कर आश्मान को निहार रहे हैं ,निहारते रहें मगर यदि कभी निचे झांक कर वो देखें तो मुझे जरूर ढूंढे,मुझे अच्छा लगेगा। लेकिन साला कोन कहता है की दूरियां नजदीकियां बढाती है यहाँ तो फासले की हद ही नहीं है।
भक्क साला ये जिन्दगी भी कोन कोन सा नखरा दिखाती है, और हमें साला पिछवाड़े की गरम सुर्ख हवाओं की तरेह छोड़ जाती है जिसे ना तो कोई पसन्द करता है और ना कण्ट्रोल।
Sunday, March 22, 2015
"भक्क् जिंदगी..."
मैं स्वाभाव , चित्त और चरित्र से कवि हूँ। माँ हिन्दी का एक असक्षम , अदना सा पुत्र जो अपनी विचारों को अभिव्यक्ति देना चाहता है। साहित्य से समाज की चेतना और चरित्र बदलने का स्वपन रखता है। और आजन्म माँ हिन्दी की सेवा करने को तत्पर है।
मैं अन्यथा व्यवसाय से एक अभियंता हूँ। बस..
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