Thursday, September 14, 2017

अंतर्विरोध

मैं कुछ कहता, तो बात थी
निःशब्द चुप्पी भी मेरी, उसे मेरी वाक्यों से रूबरू कर देती है
अजीब इतेफाक है..आज शब्द गौण और चुप्पी मुखर है

लो ये क्या हुआ..शोर उठने लगा..
उफ़ आन्तरिक व्योम भी एक अब्द के बाद चरित्र बनने लगा
साहसिक कदम अब ठिठक मस्तियाँ करने लगी
विचार विरोधक और सहिष्णुता अवरोधक सी प्रतीत होंने लगी
लो ये क्या हुआ ..फिर से शोर उठने लगा..

अरे जरा देखो तो दर्पण को, ये श्याही कैसी?
सामाजिक विरोध का कालिख तो नहीं..?
हाँ जरूर ये प्रतिबिम्ब प्रकाश के विलोम सा ही तो है!!
इतिहास और प्रेरणा की स्वर्णाक्षर विलोपित हो,बिन्दुबत हो रहा है
पकड़ो इस की परिधि को, जरा विस्तारित करो
नहीं ये स्वविस्तार की सक्ल्पना है..ऐसे नहीं विस्तारित होगा
ढूँढना होगा तुम्हे.. फिर से ..विस्तार से..परिभाषा को..सच्चाई को
आज फिर से अंतर्द्वंदो को सतेह पर लाना होगा
नहीं तो ये शोर उठते रहेंगे..अनन्त तक........

लो चल पड़ो अकेले..डगर की आपाधापी में..
निःशब्द ..मुखरता और विविचेना की सीधी लकीर पर..
चलते रहो उन पर ही अनंत तक..
शायद कल को शोर थम जाये...

भास्कर

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