Saturday, August 18, 2018

संवेदनाओं के स्वार्थ

https://youtu.be/C3PzkRHz5X4

Tuesday, August 7, 2018

अंतरद्वंद

      "अंतरद्वंद"
कहने की बारी मेरी थी अब
सुनते ही तो बड़ा हुआ था
मन के अंदर भी कुछ बातें
यूँ ही दशकों से पड़ा हुआ था
सोचा मैंने भी की चलो अब
साहस कर ही लेते हैं
खुल कर के सब कुछ बोल ही देते हैं
गुमनाम चुप्पी का सबब
कब तक खुदगर्जी को देंगे
अबकी बार सब कुछ छोड़ कर
स्वयम् को स्वयम् से ही परिचय देंगे

जोर लगाई थी मैंने अबकी बार
एकाकी में बैठ स्वयम् से
आखिर कह दी थी मैंने
खुद से ही खुद की बात
अब बात यूँ सजग हुई
अन्तः मन से निकल कर
ओंठों के संग संलिप्त हुई
बुदबुदाते ओंठों ने चेहरे की
भंगिमाओं को स्वरूप भी दिया था
मैंने शायद खुद को फिर से
खुदगर्जी में ही बल दिया था

अब शब्द हाहाकार बन
यूँ ही प्रस्फुटित हुई थी
अन्तः मन का स्वरूप
आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुई थी
शब्द वेदना में मैं प्रखर गतिमान रहा
और इधर शब्दों के संग अश्रुओं ने भी
अपना उपस्थिति प्रत्यक्षमान किया
रुँधते गले से शब्दों का विचरण
अब बाधित था
स्वयम् के समक्ष मैं , स्वयम् ही प्रताड़ित था
शारीरिक अवस्थाएँ भी अब साथ छोड़ चुकी थी
मैंने अब विलोपन में शून्यता को संजो ली थी
घुटने के बल बैठ मैंने दोनों हाथ चेहरे पर रखे थे
अंतरद्वंद के उल्लासित  फ़लसफ़े को
आमंत्रित कर अब खुद में ही खो गए थे !!

भास्कर


Sunday, June 3, 2018

"मायावी विश्व के चक्रव्यूह "

दूर फैले, ख़ामोशी के शोर में
फ़ैल जाती जब कोलाहल आहिस्ते
यूँ,
अतीत के अमर्त्य इस्थिरता से
वर्तमान की स्व-व्यवस्थता से
और भविस्य की गौण ज्यामिति से
तब, सहसा
संवेदना जड़वत हो उठती,
सुसुप्त यादेँ जिवंत हो उठती
और अंतर्मन के अल्फ़ाज़ सहज सघन
फिर
ललकारती परिस्थितियां,
अकाट्य चक्रव्यूह सा सामने दिखती
बौद्धिक विवेक मानों प्रार्थना करती
और स्वप्न की हसरतें क्रीड़ा करती
फिर
ढूँढता मैं
अपने अल्फ़ाज़ों के उस अवलम्ब को
इस्थिरता के अवतार को
साकार प्रतिरूप को
और मेरे निश्चिन्तता के नियति को
और
हर प्रतिबिम्ब में दिखती वो
उपस्थित ,शास्वत रूप से
फिर मैं,
आँखे बंद करके इस्थिरचितता के साथ
एकटक दीवालों को घूरते हुए
निशा के चादर में गुम हो जाता
अश्रुबूँदों के लाव लश्कर को समेटे हुए
और ,
हर सुबह शुरू हो जाता,
कशमकश, आपाधापी लिए
और संग लपेटे एकाकीपन के चादर को
उनमे गुम हो मैं, खो जाता कहीँ
मायावी विश्व के चक्रव्यूह में......

भास्कर

Friday, April 6, 2018

माँ

माँ क्या आप सच में ही, मुझ से चिढ़ तो नहीं गई थी ना
मेरी बातें सुनके आप , अस्तब्ध तो नहीं पड़ी थी ना
मैं यूँ सोचूँ की आप, फिर क्यूँ यूँ नाराज हुई
बिना कहे अनायास ही, यूँ कैसे आप चली गई
कल की ही तो बात थी माँ, आपने मुझसे पूछा था
की देर कैसे हो गई , ये पूछ कर के डांटा था
मुझे याद है मेरे फिक्र में  आपने खाना भी न खाई थी
मेरे इंतज़ार में चौखट पर नज़र गड़ाई बैठी थी
हर आहट पे चौंक कर के आप मुझको ढूंढा करती थी
मेरे आने पर जब आप गुस्सा किया यूँ करती थी
बिना बताए जाने पर आप, मुझे बुरा भला कहती थी
फिर माँ , आज क्यूँ आप स्वयम् अपनी ही बातों से मुकर गई
यूँ तन्हा वियोग में हमें , अनायास छोड़ कर चली गई
कुछ तो गलती जरूर थी मेरी, जो आपने ऐसा व्यवहार किया
खुद को मुझसे इतना दूर ले जाके जाने कैसा व्यवहार किया
आखिर गलती हुई थी मुझसे तो आप मुझको दुत्कार देती
पर कम से कम भैया को ही सही, कुछ दिन और अपना दुलार देती
अच्छा रहने दो आप मुझे पता है, आप क्यों यूँ चली गई
मुझे सम्मुख देख कर के क्यूँ यूँ मुँह फेर गई
गलती हुई थी मुझसे तो मुझे दो थप्पड़ लगाना था
मुझको खुद से दूर करने का कैसा ये हरकत बचकाना था
मेरी शरारतों पर पहले कैसे आप मुस्काती थीं
आज अचानक क्या हुआ जो, पुत्र स्नेह न प्यारी थी
मेरी छोड़ो माँ,उस इस्थिति प्रज्ञ पुरुष की क्या गलती थी
कल तक जो चट्टान सरीखा आज उनकी भी दोनों आँखे गीली थी।
मुझे ऐसा लगता है कि, गलती मेरी ही रही होगी
और मेरे गलती से ही आप मुझसे चिढ़ गई होंगी
नाराज़ हो के ही मुझसे यूँ, इतनी दूर चली गई होंगी ..........

भास्कर








Monday, April 2, 2018

संवाद 3 (माँ और मैं)

माँ, आप कितनी इत्मीनान से सुना करती थी ना मुझे, जब भी कुछ लिख कर के आपको सुनाता, आप मानों मेरे शब्दों के बहाव में सफ़र किया करती थीं। आज जब आप नहीं हैं तो मेरी हर रचनाएँ अधूरी सी लगती है। मुझे ऐसा लगता है कि मैं शब्दविहीन नहीं बल्कि अर्थविहीन हूँ।
पता है माँ , आप जों कहती थी न मुझे की मैं अपने लेखनी का अभेलना करता हूँ, ईश्वरीय आशीर्वाद का निरादर करता हूँ, जो मैं अपनी इस प्रतिभा को अपने तक रखता हूँ। आप कहते कहते थक गई लेकिन मैंने कुछ नहीं किया, क्योंकि जब भी आपको सुना देता था न वो अपनी रचनाओं को, लगता था कि सारा विश्व को सुना दिया मैंने, और आज जब शारिरिक रूप से आप गौण हैं तो मैं हर काव्य मंच पर अपनी रचनाओं को पढ़ता फिरता हूँ, और दर्शकों में आपको ढूंढने को प्रयासरत रहता हूँ , और हर बार हार जाता हूँ खुद से।
मैंने आपको अपने संवादों में, शब्दों में और सहस्त्र स्वपनों में आपके वितचित्र खिंचने की कोशिश की, मगर हर बार नाकाम हो जाता हूँ। शायद ब्रह्माण्ड में कोई शब्दावली नहीं बनी जो माँ के प्रारूप को प्रत्यक्ष कर सके।
पता है, वो जो आप कहती थी न मुझसे की मुझमें बचपना है, और मैं हर बार आपसे इस बात पे बहस करता, आज ऐसा प्रतीत होता है कि आप ठीक ही कहती थी। पता है , आज मैं पिताजी से, मुम्बई में मिलकर वापस जा रहा हूँ, उन्होंने आते टाइम मुझे 200 रुपये दिए , मैंने मना किया मगर उन्होंने जबरदस्ती मुझे दिया और कहा कि तुम अभी बच्चे हो, रख लो रास्ते मे काम आएगा। माँ आज पिताजी की आँखे नम देखी, शायद वो पिताजी हैं, इसीलिए चाह कर भी ये ना बोल पाए कि कुछ दिन और रुक जाओ, और मैं ये सब समझते हुए भी नहीं रुक पाया। पता है ये ज़िन्दगी की आपाधापी से मैं अब ऊब गया हूँ, मुझे कभी कभी सब कुछ छोड़छाड़ कर भाग जाने का दिल करता है, मगर जब आंखे बंद कर के सोचता हूँ तो आप सर्वत्र दिखती है, फिर में शांत हो जाता हूँ और ज़िन्दगी मुझे अपने हिसाब से जीती जाती है, और मैं उसका पिछलग्गू बन के परिक्रमा करते रहता हूँ..और शायद करता ही रहूँगा जीवन के जीवन्त लीलाओं तक।

भास्कर

Monday, March 12, 2018

माँ

https://youtu.be/wFfLPA-AAEw

Sunday, January 21, 2018

कोमल किशलय के अंचल में

"कोमल किशलय के अंचल में"

उतश्रृंखल नयन गहन विषाद में
तड़पता मन सुख अंचल आश में
विस्मृत तन-मन सूखे आषाढ़ में
बह चला कहीं अनंत वियाग में

मैंने पाया स्वतृष्णा को
        उदमत् गृह आस पास में
मय मय था सानिध्य उसका
        रचता बसता उस गृह पास में
मधुशाला का नाम न लेना
         वह भी कम था उस गम आवेश में
गिरता पड़ता बरबस ठहरता
         लोप था वह "उसके" संग में
ठहरी रूप उन्मत यौवन था
          काम -पाश भी थी अंग अंग में
देखा जब उसने मधुहारी
          उस यौवन को पराये संग में
जिन्दा वियोग, मृतप्राय कामसूत्र
           नश नश स्थूल था अब उसके जीवन में

काम तृष्णा या प्रेम संचरण
        पता नहीं क्या था उसके मन में
ढूँढता खुद को अतृप्त गगन
        संसृत आगार, विस्मित मन में
प्रेम था या रहा आकर्षण
         परिभाषा ढूँढता वह अपने मन में
वियोगी कहलाऊं या कहलाऊँ पागल
          यही ठहरती थी अब उसके मन में

प्रेम निर्वात या शून्य था वो
          गगन अदृश्य एक ब्रह्म में
नितांत एकांत के अश्वरथ पर
          बैठ चला था वह प्रेम अगन में
बैठी काया, निर्मल मन था
           जैसे पंकज निर्मल जल में
हाय, विरह के संवेदित स्वर से
           गूंजता हर पल वह स्थिर पवन में

दुःख दरिया की निंदित काया
           प्रेम पाश के विहरित अस् में
घूँट रहा रहा था वह पल पल
            जैसे जठरनाल भूखे उदार में
हाय "रे" प्रेम की वह अभिलाषा
            जल रही थी तुमुल विकल में
बून्द बून्द कतरा आँशु के
             तापश प्रेम अनन्त विरह में

ढूंढा जब उसने वह अक्स नयन में
              खड़े होकर उस निज दर्पण में
पाया उसने समवेत निशा को
              झिल-मिल झिल-मिल ज्योतिर् तन में
नित-नित कर्म जैसे वो भास्कर
              खड़ा था वो मानो मरुस्थल में
वियावनि संसर्ग और विहरित काया
               ढूंढ रहा था वह उस दर्पण में

ढूँढता रहा वह प्रेम परिभाषा
                चारि तरफ वह अपने अंतर में
प्रेम शाश्वत या प्रेमी शाश्वत
                 उथल पुथल थी अब उसके मन में
वह सोचता रहा यूँ ही मगन में
                 हाय तू क्यों आई मेरे जीवन में
कितना अच्छा एक प्रवार था मैं
                 अब शीतरक्त हूँ ,जैसे जीवन में

जीने दे अब तू मुझको
                  एक नहीं सौ सौ दीपक में
ढूंढते रहना अब तुम खुद को
                  इस अप्रेम विरह के वियागी विश्व में
मैं जनता हूँ, ज्योति नहीं निशा सत्य है
                  लेकिन फिर मैं जीता "भास्कर" के तन में
ज्योतिर्मय होगी कम से कम जीवन
                   "कोमल किशलय के उस अंचल में"

भास्कर

Tuesday, January 16, 2018

"क्या कोई माँ कहके के बुलाता है"

क्या वहां पर भी आपको कोई माँ कहके बुलाता है
पुत्र स्नेह का माया क्या वहां पर भी धाता है
जब ईश्वर आपसे पूछते होंगे, कुछ बतलाओ अपने बारे में
आप जरूर निःशब्द हो जाती होगी, संतति स्नेह के साये में
चर्चा वहां भी होती होगी, आपके वात्सल्य की गाथा की
प्रेम, स्नेह और ममत्व के आश्चर्यजनक परिभाषा की
मेरे चर्चे होने पर, हँसी के फव्वारे तो छूटे होंगे
नादानी के मेरे विषयों पर, सबने मुश्कान बिखेरे होंगे
बात जब आती होगी भैया की,आदर्श जरूर रेखांकित होती होगी
एक विशेष परिभाषा से रिश्तों की संज्ञान गढ़ी गई होगी
पुत्र हो या भ्रातृ स्वरुप वो हर रूप में नया युग लिख जाते हैं
आपके संस्कारों को मानो अंतर्मन में धा जाते हैं।
आप ये सब देख कर बस प्रेमभाव मुस्काती होंगी।।
हमारे वर्तमान के अवलंबों पर आशीष तो धाती होंगी !!

ईश्वर भी ये सब सुन कर अचंभित तो जरूर हुआ होगा
अपने सृजन के इस स्वरुप से , आत्ममुग्ध तो रहा होगा
पिताजी का वो इस्थितिप्रज्ञता उन्हें स्वयम् स्वरूप तो लगा होगा
आपका संघर्ष और समर्पण एक युग व्यतीत रहा होगा
मैं मानता हूँ , तभी ईश्वर भी इतना स्वार्थी बन गया होगा
आपको हमसे दूर ,निज के सानिध्य में ले गया होगा।
वो जरूर जलता होगा हमसे , जो आपको छीन ले गया हमसे
लेकिन ऐसा करके वो जरूर स्वयं से हार गया होगा
बता देना आप उनसे, हम दूर कहीं न जायेंगे
हम उसी राह पर चलकर अप्रितम इतहास बनाएंगे

पर माँ आज भी एक बात मुझे फिर से सताता है
आप सच, सच कहना,
क्या वहां पर भी कोई आपको माँ केह के बुलाता है।

भास्कर

Sunday, January 14, 2018

कुछ कर के दिखलाओ

"कुछ कर के दिखलाओ"

हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

शैशव से ही देखो असीम संभावनाएं
ईश्वर की भी तुम से है
तुम ही हो सर्वश्रेष्ठ चराचर
अपना हुनर तो दिखलाओ
छोड़ो आलस और संकीर्णता को
नब्ज नब्ज में स्फूर्ति लाओ
मत बैठो हाथ जोड़कर
अपनी प्रचंडता तो दिखलाओ
झाँको खुद में एक बार तुम
खुद को ही फिर से पहचानों
अरे ! वत्स तुम मनुज पुत्र हो
मनुजता तो दिखलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

सर्वानंद, सर्वानुभू तुम हो
सर्वाभाव को दूर भगाओ
मानव तुम सर्वोत्तमुख, सर्वांग भी हो
अपना सर्वाधिकार् फहराओ
संसिद्धि तुम्हे गर्भ में मिली है
संस्कारयुक्त भी हो तुम मानव
फिर क्यों आज संस्तंभ पड़े हो
अपनी संस्तुता को फिर से जगाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

मुदिर हो तुम तो क्या हुआ
अब तो मुदगर बन दिखलाओ
मुमूर्षा का भाव त्यागकर
मुमुक्षता तो बतलाओ
मुखापेक्षी मत बनो नर "रे"
मुकुरित, मुखामृत दिखलाओ
मार्दव, मार्मिकता को अपनाकर
अब तो मातंगी बन बतलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

ऋत्विक और ऋतंभरा भी तूम हो
अपनी ऋक्षिका को जगाओ
"हे" ऋक्षेश मानव तुम
ऋत , ऋजुता को अपनाओ
उर्द्धस्थित, उर्ध्वांग हो तुम
प्रज्ञ उर्मि को तो लहराओ
मत रहो उर्ध्वबाहु तुम
उर्ध्वपुंड्र बन बतलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

उर्जस्विनी, ऊर्णा के आगोश को छोड़कर
उर्ध्वकेतु बन दिखलाओ
उतकंठिता की व्योम नहीं हितकारी
रोम रोम तुम मत सहलाओ
देखो ! छोड़ो अब इन बाँहों को
अपना उत्तरदायित्व तो निभाओ
हे मानव मनुज वंसज तुम, अब तो कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

भास्कर