Sunday, January 14, 2018

कुछ कर के दिखलाओ

"कुछ कर के दिखलाओ"

हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

शैशव से ही देखो असीम संभावनाएं
ईश्वर की भी तुम से है
तुम ही हो सर्वश्रेष्ठ चराचर
अपना हुनर तो दिखलाओ
छोड़ो आलस और संकीर्णता को
नब्ज नब्ज में स्फूर्ति लाओ
मत बैठो हाथ जोड़कर
अपनी प्रचंडता तो दिखलाओ
झाँको खुद में एक बार तुम
खुद को ही फिर से पहचानों
अरे ! वत्स तुम मनुज पुत्र हो
मनुजता तो दिखलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

सर्वानंद, सर्वानुभू तुम हो
सर्वाभाव को दूर भगाओ
मानव तुम सर्वोत्तमुख, सर्वांग भी हो
अपना सर्वाधिकार् फहराओ
संसिद्धि तुम्हे गर्भ में मिली है
संस्कारयुक्त भी हो तुम मानव
फिर क्यों आज संस्तंभ पड़े हो
अपनी संस्तुता को फिर से जगाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

मुदिर हो तुम तो क्या हुआ
अब तो मुदगर बन दिखलाओ
मुमूर्षा का भाव त्यागकर
मुमुक्षता तो बतलाओ
मुखापेक्षी मत बनो नर "रे"
मुकुरित, मुखामृत दिखलाओ
मार्दव, मार्मिकता को अपनाकर
अब तो मातंगी बन बतलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

ऋत्विक और ऋतंभरा भी तूम हो
अपनी ऋक्षिका को जगाओ
"हे" ऋक्षेश मानव तुम
ऋत , ऋजुता को अपनाओ
उर्द्धस्थित, उर्ध्वांग हो तुम
प्रज्ञ उर्मि को तो लहराओ
मत रहो उर्ध्वबाहु तुम
उर्ध्वपुंड्र बन बतलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

उर्जस्विनी, ऊर्णा के आगोश को छोड़कर
उर्ध्वकेतु बन दिखलाओ
उतकंठिता की व्योम नहीं हितकारी
रोम रोम तुम मत सहलाओ
देखो ! छोड़ो अब इन बाँहों को
अपना उत्तरदायित्व तो निभाओ
हे मानव मनुज वंसज तुम, अब तो कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

भास्कर

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