"संवेदनाओं का स्वार्थ"
सावधान से विश्राम की जो ये पहल है
अब कालजयी है,अशक्त है
अभिप्राय से पृथक है
विवेचनाओं से विलग है
भावनाओं की भंगिमा है
और वयम् से अहम् है
ये सब कुछ नहीं बस
निज संवेदनाओं का स्वार्थ है
ये, ये जो अश्रुलिप्त लोचन है
ये ,ये जो रुग्ण रुदन है, ये व्यथा है
व्यवहार जो गौण है, शिथिल है
उदासी जो ये प्रखर है,
ये सम्बन्धों का अभिसार है
आपक्ता का संभार है
और यही संवेदनाओं का स्वार्थ है।
ये, वो जो चली गई जो दे कर
एहसासों का ,ममत्व की, वात्सल्य की गाथा है
ये, ये जो बंधन है, लगाव है
अभिप्राय है अपनत्व का
ये,ये जो उनके खो जाने का यथार्थ है
ये सत्य नहीं है, ये छदम् है
ये, ये जो गौण उपस्थिति है उनकी
ये अमरत्व का प्रमाण है,
और ये, ये जो मेरा संताप है
आत्मचिंता का अभिलेख है
स्वयं का संघार है और निजता का प्रमाण है
ये,ये कुछ नहीं बस संवेदनाओं का स्वार्थ है
ये, ये जो मानवीय लगाव है,संवाद है
संवेदनाएं हैं, भावनायें हैं
ये स्वार्थ निहित है,
ये भी मैं और हम से अभिप्रेरित है
ये ,ये जो जीवन की अभिलाषा है
ये स्वार्थों की परिक्रमा है
शैशव से शव यात्रा तक,
अपेक्षाओं का अवस्थाएँ है
ये, ये जो स्वरुप है सम्बन्धो का
यही स्वार्थ है,
और ये ,ये जो स्वार्थ है,
संवेदनाओं का जननी है
और ये स्वार्थ का संवेदना है
या संवेदनाओं का स्वार्थ है ।।
भास्कर
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