चारो तरफ आज,जब उल्लास मदमस्त था तो कहीं कोई आँखे अब भी मानो किसी चीज़ का राह देख रहा था। शायद वो उम्मीदों की चुप्पी और संघर्षों की ख़ामोशी थी जो आज मेले में भी शान्तचित थी । बस निहार रहे थे तो आसमान के रंगीन चादर को जो उसे बदरंग दिख रहा था। अजीब फासले थे, आज जिन्दगी के भी..वो उदास था और प्रस्थिति प्रफुल्लित।
जिंदगी अब भी एकतरफा ही था..बस संघर्षो के किनारे पलटते रहते थे। लेकिन हर किनारे पर शोर एक जैसा ही था,बस प्रकृति के चित्र बदल जाते थे, कभी पात्रों के किरदार बदल जाते थे..तो कभी रंगमंच का पर्दा बदल जाता था ,कभी दर्शक बदल जाते थे..बस जो चीज शाश्वत सी थी वो था चरित्र बदलने की।
मैंने बरबस ही आखिर पुछ ही लिया था, भाई कोई दिक्कत है तो बता..बस उसने मुस्कुराया था और ना में सर हिला दिया। और कुछ बुदबुदाने लगा..मैंने कानों पे जोर डाला था..कुछ समझ नहीं आया मुझे बस समझ में जो आया वो था..बेबाक चुप्पी जो आतंरिक द्वंद का फलसफा था। मगर अन्दर कोई चिंता का समुन्दर हिलकोरे ले रहा था। हर बार जब चिंता की लहरे किनारे को छुति तो चेहरा और चरित्र दोनों धूमिल और धुंधला सा दिखने लगता।
यूँ ही वो सब कुछ शोरों के कोलाहल में एकांत में बैठ कर कुछ लिखता रहा और मै उसे जानने की कोशिस करता रहा। पर अब वो खड़ा हो गया था..आसमान की ऒर कुछ देर तक देखता रहा फिर मुड़ गया अचानक और तेज कदमों से चल पड़ा, मैं भी उसके पिछे हो लिया था। अब उसकी कदम एक तालाब के किनारे रुकी थी,वो अब भी रुक कर आसमानों को ही देख रहा था मगर पानी में। बहूत देर तक वो यूँ ही देखता रहा आसमान को पानी में फिर अचानक पानी को हाथों से हिलकोर कर फिर से आसमानों को उसमे देखने की कोशिस करने लगा था वो। कुछ देर ऐसा करने के बाद वो मुस्कुराया था,मानों उसे सत्य से परिचय हो गया हो। वो अब एक आत्मिश्वास के साथ कदम पलटा था और तेज कदमों से मुस्कुराते लौट पड़ा था घर को।।
मैं उसकी आत्मस्थिति और व्यवहार से संवेदित था और सोच रहा था की सायद वो आसमानी परिस्थितयों का तस्वीर बिभिन्न कैनवास में देखा था,हर कैनवास अपना अलग प्रकृति और चरित्र रखता है..सायद जिंदगी के साथ भी ये चीज़े कहीं न कहीं उसे जुड़ती दिखी थी ।
उसके सवालो का जवाब ये था की नही मुझे नहीं पता पर आज मैं ज्यादा संवेदित और प्रकृति चिर गुरु सा दिख रहा था। असीम सवालो और अनंत जवाबो के साथ।
जिंदगी अब भी एकतरफा ही था..बस संघर्षो के किनारे पलटते रहते थे। लेकिन हर किनारे पर शोर एक जैसा ही था,बस प्रकृति के चित्र बदल जाते थे, कभी पात्रों के किरदार बदल जाते थे..तो कभी रंगमंच का पर्दा बदल जाता था ,कभी दर्शक बदल जाते थे..बस जो चीज शाश्वत सी थी वो था चरित्र बदलने की।
मैंने बरबस ही आखिर पुछ ही लिया था, भाई कोई दिक्कत है तो बता..बस उसने मुस्कुराया था और ना में सर हिला दिया। और कुछ बुदबुदाने लगा..मैंने कानों पे जोर डाला था..कुछ समझ नहीं आया मुझे बस समझ में जो आया वो था..बेबाक चुप्पी जो आतंरिक द्वंद का फलसफा था। मगर अन्दर कोई चिंता का समुन्दर हिलकोरे ले रहा था। हर बार जब चिंता की लहरे किनारे को छुति तो चेहरा और चरित्र दोनों धूमिल और धुंधला सा दिखने लगता।
यूँ ही वो सब कुछ शोरों के कोलाहल में एकांत में बैठ कर कुछ लिखता रहा और मै उसे जानने की कोशिस करता रहा। पर अब वो खड़ा हो गया था..आसमान की ऒर कुछ देर तक देखता रहा फिर मुड़ गया अचानक और तेज कदमों से चल पड़ा, मैं भी उसके पिछे हो लिया था। अब उसकी कदम एक तालाब के किनारे रुकी थी,वो अब भी रुक कर आसमानों को ही देख रहा था मगर पानी में। बहूत देर तक वो यूँ ही देखता रहा आसमान को पानी में फिर अचानक पानी को हाथों से हिलकोर कर फिर से आसमानों को उसमे देखने की कोशिस करने लगा था वो। कुछ देर ऐसा करने के बाद वो मुस्कुराया था,मानों उसे सत्य से परिचय हो गया हो। वो अब एक आत्मिश्वास के साथ कदम पलटा था और तेज कदमों से मुस्कुराते लौट पड़ा था घर को।।
मैं उसकी आत्मस्थिति और व्यवहार से संवेदित था और सोच रहा था की सायद वो आसमानी परिस्थितयों का तस्वीर बिभिन्न कैनवास में देखा था,हर कैनवास अपना अलग प्रकृति और चरित्र रखता है..सायद जिंदगी के साथ भी ये चीज़े कहीं न कहीं उसे जुड़ती दिखी थी ।
उसके सवालो का जवाब ये था की नही मुझे नहीं पता पर आज मैं ज्यादा संवेदित और प्रकृति चिर गुरु सा दिख रहा था। असीम सवालो और अनंत जवाबो के साथ।
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