आहिस्ता आहिस्ता ग़मों का कारवाँ निकला था
व्याधियों की महफ़िल भी सजी थी कहीं
गमजदों का काफ़िला व्याकुल हो हमकदम थे
चेहरों की शिकन भी कुछ आरोही सा था
व्याधियों की महफ़िल भी सजी थी कहीं
गमजदों का काफ़िला व्याकुल हो हमकदम थे
चेहरों की शिकन भी कुछ आरोही सा था
लगे थे मेले भी आज सांत्वना का
अनवरत इल्जमातों का श्रृंखला भी थी कहीं राहों में
विलोम हो धैर्य भी पिछवाड़े पे दम भर रहा था
ऐसे में विसंगतियां गले लगने को आतुर सी थी
चरित्र और संस्कार आज परीक्षा को था
और विपरीतता हमेशा की तरेह
माहौल सजा रहा था ।।
अनवरत इल्जमातों का श्रृंखला भी थी कहीं राहों में
विलोम हो धैर्य भी पिछवाड़े पे दम भर रहा था
ऐसे में विसंगतियां गले लगने को आतुर सी थी
चरित्र और संस्कार आज परीक्षा को था
और विपरीतता हमेशा की तरेह
माहौल सजा रहा था ।।
मनुज पुत्रों की ये वैर अब
सहिष्णुता को शिथिल कर रही थी
दंभ धर्म और जातीय जातकों का
अभ्युदय होने लगा था
और एक अलग व्यापर का
नापाक शुरुआत हो चुकी थी
मानवता अब पथभ्रमित हो आसमान निहार रहा था
प्रेम भी आवेशित हो अन्धकार में ससेंध मार रहा था
और निजता शीर्ष पर बैठ तांडव।।
सहिष्णुता को शिथिल कर रही थी
दंभ धर्म और जातीय जातकों का
अभ्युदय होने लगा था
और एक अलग व्यापर का
नापाक शुरुआत हो चुकी थी
मानवता अब पथभ्रमित हो आसमान निहार रहा था
प्रेम भी आवेशित हो अन्धकार में ससेंध मार रहा था
और निजता शीर्ष पर बैठ तांडव।।
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