Monday, October 30, 2017

संवेदनाओं का स्वार्थ

"संवेदनाओं का स्वार्थ"

सावधान से विश्राम की जो ये पहल है
अब कालजयी है,अशक्त है
अभिप्राय से पृथक है
विवेचनाओं से विलग है
भावनाओं की भंगिमा है
और वयम् से अहम् है
ये सब कुछ नहीं बस
निज संवेदनाओं का स्वार्थ है

ये, ये जो अश्रुलिप्त लोचन है
ये ,ये जो रुग्ण रुदन है, ये व्यथा है
व्यवहार जो गौण है, शिथिल है
उदासी जो ये प्रखर है,
ये सम्बन्धों का अभिसार है
आपक्ता का संभार है
और यही संवेदनाओं का स्वार्थ है।

ये, वो जो चली गई जो दे कर
एहसासों का ,ममत्व की, वात्सल्य की गाथा है
ये, ये जो बंधन है, लगाव है
अभिप्राय है अपनत्व का
ये,ये जो उनके खो जाने का यथार्थ है
ये सत्य नहीं है, ये छदम् है
ये, ये जो गौण उपस्थिति है उनकी
ये अमरत्व का प्रमाण है,
और ये, ये जो मेरा संताप है
आत्मचिंता का अभिलेख है
स्वयं का संघार है और निजता का प्रमाण है
ये,ये कुछ नहीं बस संवेदनाओं का स्वार्थ है

ये, ये जो मानवीय लगाव है,संवाद है
संवेदनाएं हैं, भावनायें हैं
ये स्वार्थ निहित है,
ये भी मैं और हम से अभिप्रेरित है
ये ,ये जो जीवन की अभिलाषा है
ये स्वार्थों की परिक्रमा है
शैशव से शव यात्रा तक,
अपेक्षाओं का अवस्थाएँ है
ये, ये जो स्वरुप है सम्बन्धो का
यही स्वार्थ है,
और ये ,ये जो स्वार्थ है,
संवेदनाओं का जननी है
और ये स्वार्थ का संवेदना है
या संवेदनाओं का स्वार्थ है ।।

भास्कर

Thursday, October 19, 2017

अब दीवाली "एक संवाद और निजव्यथा"

दीवाली हमेशा से ही स्याह और काली रही है, इस बार भी कुछ अलग नहीं है। अमावस्या सैदव की तरह ऊर्जावान है और तटस्थ भी। मगर सदैव प्रकाश और उत्साह उसके स्याह को मलिन किये रहता था।
ये दीवाली हमारे लिए कुछ ज्यादा ही घनघोर और रंगहीन सा लग रहा है। वैसे ही जैसे स्याम रंग का प्रकृति है, सारे रंग को अवशोषित करने या अपने में समाहित करने की। ऐसा प्रतीत हो रहा है की ये वास्तविक में हमारे जिंदगी के सारे रंगो को लील लिया हो जैसे। प्रकृति का ये बदरंग दीवाली का शायद कोई विकल्प नहीं है, इसकी कोई क्षतिपूर्ति नहीं है न ही कोई समाधान मगर मानसिक अवस्थाओं पर भी तो कोई जोर नहीं है।
हालांकि प्रकृति की ये अवस्था भी अब ग्राह्य है मगर कई बदलाव के साथ, कई व्यथाओं के साथ , कई अविस्वास और विस्वास के बीच और अर्थ और अनर्थ के द्वन्द के बीच।
बदलाव सदैव जिंदगी को स्वीकार नहीं होता, और ये बदलाव निश्चित ही विध्वंश है हमारी सम्पूर्ण जिंदगी के अध्याय में। विवेचना और आत्मसंघर्ष के बिच की कड़ी का सत्य थोड़ा मुश्किल सा लग रहा है जो अंतर्मन को कचोटता है, उनकी उपस्थितिहीनता को अब भी असत्य मानता है और अब भी भविष्य , भुत और वर्तमान की परिस्थिति को अनुमानित कर अचेतना में है, एक सुगम्य रास्ते की तलाश में है जो अर्थहीन है सभी मायनों में।
गीता का समस्त ज्ञान मानों सिमट सा गया है,और "स्थितिप्रज्ञता" की पहल अनावश्यक सा लग रहा है। और "चरैवेति चरैवेति" की दिक् दृष्टता हिलकोरे लेते दिख रहा है कहीं बिच भँवर में।
संवेदना, भावुकता और सम्बन्धो के बिच की कड़ी इस गृहस्ता आश्रम का मूल है जो सामाजिक,सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है जहाँ पर इस लोक और परलोक की सारी परिकल्पनाएं क्षीण लगता है और कृष्ण का अर्जुन के  साथ का संवाद तर्कहीन । शायद ये संवाद गृहस्थ के लिए नहीं है ये क्षत्रिय के लिए हो। अगर गृहस्थ के लिए होता तो शायद ये संवाद स्वयं पुरषोत्तम राम कर रहे होते। मगर वो स्वयं इसी विवेचना और पारिवारिक संबंधों के विभिन्न स्तरों पर उलझे रहे और मानवीय संवेदनशीलता , अश्रुलिप्त विलाप, आत्मीय सम्बोधन और मिलन और बिछड़ाव के बिच भावनाओं में डूबे रहे। और हमें एक संजीदा जीवन को जीने का आदर्श देते रहे।
शायद तभी मैं ये मानता हूँ की मेरा व्यवहार और भावुक आँशु शायद अर्थहीन तो नहीं है। और इस दर्द का एहसास इतना सहज नहीं है की उसे "स्थितिप्रज्ञ" बन कर सुगम्य बना दिया जाये। सजल नयन और भावुक मन तो आत्मीयता का एहसास मात्र है,। मातृत्व, ममत्व और वात्सल्य का अनंत प्रेम इन गिनती के अश्रुबूंदों से कमजोर तो नहीं होगा बल्कि उसका एहसास और भी सबल होगा और अनंतगामि भी शायद ।
दीवाली की इस दृष्टिहीन अमावस को शायद इन आंशुओं का प्रतिबिम्ब नहीं दिख रहा होगा मगर उसे एहसास तो हो ही गया होगा शायद की उपस्थिति और अनुपस्थिति के बिच का रहस्य और सत्य के साथ सामंजस्यता का मतलब।क्योंकि दीवाली को भी एहसास तो होगा ही की उसका अपना अस्तित्व नहीं है, वो तो हर्ष, उल्लास, अपनापन, उपस्थिति और समाज के बिना गौण है।

शायद तभी दीवाली अपने एहसास के साथ गौण है,  विकल्पहीन और काली भी और हम स्वग्राह्य। मुझे तभी आज उल्लू शान्त और चमगादर सीधा बैठा दिख रहा है।और मैं गुम और एकटक आसमान की ओर उन्हें निहार रहा हूँ। इन अमावस में भी टिमटिमाते देख सकता हूँ उन्हें और मुस्कुराते भी रातभर सजल नयनों से ।

भास्कर

Tuesday, October 17, 2017

संवाद

संवाद होता था और अब भी होगा, अभिव्यक्ति नहीं रुकेगी ! संज्ञान तब भी था, और आज भी है। सवाल अब भी मैं करूँगा, और जवाब भी ढूंढूंगा। काल चिंतन का व्यथा और कालचक्र का परामर्श अब भी गौण रहेगा, सदैव की तरह,वो तब भी हावी थी और अब और भी मुखर होंगी। मैं हारूँगा नहीं , मेरा अस्तित्व का संरचना कालजयी है, और उनके ममत्व का स्पर्श शाश्वत । मैं वैभव के उत्कर्ष को पराभव में परिवर्तित नहीं होने दूंगा। क्योंकि वो यही चाहती थी।
संवाद होता था और अब भी होगा।
संवाद का शब्द और अभिव्यक्ति की श्रृंखलाएँ उन्हें जिवंत रखेगा और मुझे अभिलाषी भी ।मुझे पता है, मेरे अस्तित्व और अनवरत संवाद के स्वर उनको हर्षित करेगा और मुझे  उत्प्रेरित और सजग भी। कल भी संवाद का स्वर एकाकी था और आज भी एकाकी ही होगा बस कल तक स्वर सर्वांगसम था और आज स्वर विषम होगा। मैं कल भी बस अभिव्यक्ति था और स्वर का स्वरुप वही था और अब भी वही होगा लेकिन कल तक स्वर प्रफ्फुलित और आरोही था और अब शब्द खामोश और शून्य होगा।
गोलम्बर की परिधि अब शून्यांकित है और "मैं" रूपी त्रिज्या गौण। मुझे पता है की मेरे गोलम्बर की परिधि का वर्चस्व मेरे केंद्र की उपस्थिति को अब तक महज उपस्थिति मान कर नजरअंदाज करता रहा है , मगर जब आज केंद्र गौण है तो परिधि ही संकुचित हो कर केंद्र बनता जा रहा है। केंद्र से परिधि या परिधि से केंद्र का सत्य  अब मेरे गोलम्बर को वास्तविकता से रु ब रु करवा रहा है। अब मुझे पता चल रहा है की परिधि का अस्तित्व ही केंद्र से है। अब गोलम्बर पहले की तरह उन्मुख तो नहीं रहेगा मगर हाँ संवाद अब भी करेगा।

संवाद पहले भी होता था और अब भी होगा ।।

भास्कर

Monday, October 9, 2017

शितरक्त

"शितरक्त"
छुपा था वो आसमानों में कहीं
आकाशगंगा में या ब्रम्हांड में कहीं
दुविधा थी सजग,कहीं आसमानों में
लहरों में या बादलों में कहीं
कहाँ गुम है वो सजग प्रहरी
यह यक्ष प्रश्न विस्तारित था
हर पल मस्तिष्क और पटल पर कहीं
चल-अचल विश्वास में थे सब
देर और अंधेर की मुहावरों में कहीं
लौट आने में युग की क्यूँ देरी
विशेष और विनिमय का क्यूँ अपेक्षा
पहल तुम्हारी ही है इश्वर
फिर ये सांत्वना और समय का क्यूँ है रेखा
क्या ये चरम विशेषण विषमय की
काफी नहीं
जो अन्याय और विवेक का क्षय और निम्नतर हो ?
कब तक बहुब्रिह समास का सदुपयोग विपदा में हो ?
कब तक हम रहें रक्तमय और अश्रुलिप्त हो ?

अरे निर्णायक ..निर्णय की घड़ी को तीव्र करो अब
जरा आँखे फेरो अब ,मत रहो अब और मुक्दर्शी
छोड़ो निष्ठुरता को, मत बनो तुम भी शितरक्त अब....

भास्कर

Saturday, October 7, 2017

"माँ " और "मैं"

माँ,
ये उन सैकड़ो पत्र में से एक है जो मैं आपको अपने अकेलेपन में लिखता रहा हूँ। और खुद ही पढ़ कर उससे प्रेरणा लेता रहा हूँ। और आज फिर एक बार आपसे पत्रान्तर करना चाहता हूँ।
माँ, मुझमे कभी भी इतनी चेतना नही रही की मैं अपने संवेदनाओ को आप तक पहुँचाऊ और आपको भी अपने अंतर्मन की आवाज़ से रूबरू होने दू।
एक अजीब सी पसोपेश में रहा हूँ मैं सदैव,मुझे जिंदगी के अनसुलझे हर परिस्थिति में वैचारिक , शैक्षणिक  सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक ,और व्यावहारिक मार्गदर्शन आप से और पिताजी से ही मिलता रहा है। पर मैं आज पेशोपेश में हूँ, कई सवाल खड़े हो रहें हैं मन में ? सत्यता और उसकी वास्तविकता को ही अब मन स्वीकार करने को राजी नहीं है !! या वो सत्य है भी की नहीं, उसी पर मष्तिष्क ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया है ??
आपने हमेशा ही सिखाया की हर चीज को सकारात्मकता से देखो , जिंदगी सैदेव संजीदा और खुशहाल रहेगा, सोच में कभी द्वेष और वैमनष्य नहीं पनपेगा । आपने ये सिखाया की परिस्थितियां हावी नहीं होती मानव पर , बल्कि मानवीय अकर्मण्यता परिस्थितियों को ज्यादा बल देती है हावी होने को। आपने ये भी कहा की ईश्वरीय विश्वास और आराधना मौलिक विचारधाराओं को ठोस बनाती है और आत्मविश्वास को शदैव जिवंत रखता है।
मैंने हर वो बात मानी अब तक आपकी जो आपने सिखाया, इसीलिए नहीं की माँ ने कहा इसीलिए , बल्कि इसीलिए की मैंने उसे व्यवहारिक और तार्किक तौर पर अजमाया और उसे सभी मापदंडों पर उत्तीर्ण पाया, और वैसे भी आपने ही तो कहा था की हर तर्क को अपने व्यक्तित्व और परिस्थिति के हिसाब से अपनाने को, आपने ही कहा था आँखे मूंद कर विश्वास करने वाले लकीर के फ़क़ीर होते हैं। सवाल करने वाले ही जवाब देने योग्य बनते हैं, इसलिए सवाल बहुत ही आवश्यक और अनिवार्य है !!
आज सवाल शायद खुद से नहीं है, लेकिन विश्वास की वो अनवरत मालाओं से है, जिसने  उँगलियों पर सशब्द परिक्रमा की है, शायद  अनगिनत बार।
आज सवाल उन सभी प्रत्यक्षदर्शियों से है ,सभी साक्ष से हैं जो  उपासनाओं में सदैव उपस्थित रहे। मैं यदि आस्तिक हूँ तो शायद मेरा ये संवाद और प्रश्न उन सभी कड़ियों से पूछना आवश्यक हो जाता है जो उपासना की श्रीखंलाओं में मौजूद रहे और उसका साक्षी भी।
मैं पूछना चाहता हूँ उस आसन से, जिस पर बैठ ईश्वरीय सानिध्य से रूबरू हुआ करते थे,  उस अग्नि से, प्रत्यक्ष सूर्य से  जिसके सम्मुख कई वर्षों तक सभी अर्घ्य दान करते रहें हैं, उस तुलसी से, उस ईश्वरीय प्रतिरूप और गंगा जल से पूछना चाहता हूँ, की क्या इन साधनाओं और विश्वास का ये फलसफा कहीं कुछ अजीब या गलत तो नहीं है !! मुझे पता है जवाब का स्वरुप मुझे ही ढूँढना है और मैं इस इस्थिति में नहीं हूँ की अब भी सकारात्मकता की लँगोट पहने हर चीज़ को तर्कसंगत लेता रहूँ। मेरा तर्क और मेरी अवस्था अब प्रकृति की संरचना को ही यथार्थ मानने से इनकार कर रही है, मैं अब विश्वास की उस धर्म शास्त्र को भी चुनौती देता हूँ जो मेरे अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। मैं न तो आस्तिक हूँ और न ही नास्तिक बल्कि दोनों शब्दों के यथार्थ के पीछे लगे प्रश्न चिन्ह "?" हूँ !! और ये प्रश्न चिन्ह उसकी सरभौमिक्ता , सर्वस्ता और सर्वशक्तिमान को चुनौती है। यदि वो ये अपेक्षाएं रख रहा है अब भी की मैं मन्नतें माँगने अब भी आऊंगा तो शायद वो अपनी उपस्थिति को और भी मलिन करने पे तुला है।।

माँ, मैं क्या करूँ, इस अंतर्द्वंद का आरंभ और अन्त पता नहीं चल रहा। मैं भी उसी "गोलंबर" को निहार रहा हूँ जो जिसे कभी "रतन" निहारा करता था !!
मेरी वस्तुस्थिति भी उससे अलग नहीं है, मैं भी अपने परिधि की केंद्र बिन्दु को विलोपित तो नहीं पर अनाशक्त देख रहा हूँ। मैं देख पा रहा हूँ की मानवीय परिकल्पनाओं का सर्वशक्तिमान भी अपनी परिधि को संकुचित करता जा रहा है, और अपनी मौलिक संकल्पनाओं के अवशेष को गौण ! मैं ऐसे में किंगकर्तव्यविमूढ़ सा बस आसमान को निहार रहा हूँ। आसमान में उस शरद पूर्णिमा के दिन भी तारें गिन रहा हूँ। मुझे रास्ता नहीं सूझ रहा, हर सड़क संकीर्ण नजर आ रहा है और दूर कहीं एक आशा और निराशा के बिच की दुविधा दिख रही है...दूर तक...।।

भास्कर