Monday, October 9, 2017

शितरक्त

"शितरक्त"
छुपा था वो आसमानों में कहीं
आकाशगंगा में या ब्रम्हांड में कहीं
दुविधा थी सजग,कहीं आसमानों में
लहरों में या बादलों में कहीं
कहाँ गुम है वो सजग प्रहरी
यह यक्ष प्रश्न विस्तारित था
हर पल मस्तिष्क और पटल पर कहीं
चल-अचल विश्वास में थे सब
देर और अंधेर की मुहावरों में कहीं
लौट आने में युग की क्यूँ देरी
विशेष और विनिमय का क्यूँ अपेक्षा
पहल तुम्हारी ही है इश्वर
फिर ये सांत्वना और समय का क्यूँ है रेखा
क्या ये चरम विशेषण विषमय की
काफी नहीं
जो अन्याय और विवेक का क्षय और निम्नतर हो ?
कब तक बहुब्रिह समास का सदुपयोग विपदा में हो ?
कब तक हम रहें रक्तमय और अश्रुलिप्त हो ?

अरे निर्णायक ..निर्णय की घड़ी को तीव्र करो अब
जरा आँखे फेरो अब ,मत रहो अब और मुक्दर्शी
छोड़ो निष्ठुरता को, मत बनो तुम भी शितरक्त अब....

भास्कर

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