Friday, October 16, 2015

द्वंद

चारो तरफ आज,जब उल्लास मदमस्त था तो कहीं कोई आँखे अब भी मानो किसी चीज़ का राह देख रहा था। शायद वो उम्मीदों की चुप्पी और संघर्षों की ख़ामोशी थी जो आज मेले में भी शान्तचित थी । बस निहार रहे थे तो आसमान के रंगीन चादर को जो उसे बदरंग दिख रहा था। अजीब फासले थे, आज जिन्दगी के भी..वो उदास था और प्रस्थिति प्रफुल्लित। 
जिंदगी अब भी एकतरफा ही था..बस संघर्षो के किनारे पलटते रहते थे। लेकिन हर किनारे पर शोर एक जैसा ही था,बस प्रकृति के चित्र बदल जाते थे, कभी पात्रों के किरदार बदल जाते थे..तो कभी रंगमंच का पर्दा बदल जाता था ,कभी दर्शक बदल जाते थे..बस जो चीज शाश्वत सी थी वो था चरित्र बदलने की।
मैंने बरबस ही आखिर पुछ ही लिया था, भाई कोई दिक्कत है तो बता..बस उसने मुस्कुराया था और ना में सर हिला दिया। और कुछ बुदबुदाने लगा..मैंने कानों पे जोर डाला था..कुछ समझ नहीं आया मुझे बस समझ में जो आया वो था..बेबाक चुप्पी जो आतंरिक द्वंद का फलसफा था। मगर अन्दर कोई चिंता का समुन्दर हिलकोरे ले रहा था। हर बार जब चिंता की लहरे किनारे को छुति तो चेहरा और चरित्र दोनों धूमिल और धुंधला सा दिखने लगता। 
यूँ ही वो सब कुछ शोरों के कोलाहल में एकांत में बैठ कर कुछ लिखता रहा और मै उसे जानने की कोशिस करता रहा। पर अब वो खड़ा हो गया था..आसमान की ऒर कुछ देर तक देखता रहा फिर मुड़ गया अचानक और तेज कदमों से चल पड़ा, मैं भी उसके पिछे हो लिया था। अब उसकी कदम एक तालाब के किनारे रुकी थी,वो अब भी रुक कर आसमानों को ही देख रहा था मगर पानी में। बहूत देर तक वो यूँ ही देखता रहा आसमान को पानी में फिर अचानक पानी को हाथों से हिलकोर कर फिर से आसमानों को उसमे देखने की कोशिस करने लगा था वो। कुछ देर ऐसा करने के बाद वो मुस्कुराया था,मानों उसे सत्य से परिचय हो गया हो। वो अब एक आत्मिश्वास के साथ कदम पलटा था और तेज कदमों से मुस्कुराते लौट पड़ा था घर को।।
मैं उसकी आत्मस्थिति और व्यवहार से संवेदित था और सोच रहा था की सायद वो आसमानी परिस्थितयों का तस्वीर बिभिन्न कैनवास में देखा था,हर कैनवास अपना अलग प्रकृति और चरित्र रखता है..सायद जिंदगी के साथ भी ये चीज़े कहीं न कहीं उसे जुड़ती दिखी थी ।
उसके सवालो का जवाब ये था की नही मुझे नहीं पता पर आज मैं ज्यादा संवेदित और प्रकृति चिर गुरु सा दिख रहा था। असीम सवालो और अनंत जवाबो के साथ। 

Thursday, October 15, 2015

निजता


आहिस्ता आहिस्ता ग़मों का कारवाँ निकला था
व्याधियों की महफ़िल भी सजी थी कहीं
गमजदों का काफ़िला व्याकुल हो हमकदम थे
चेहरों की शिकन भी कुछ आरोही सा था
लगे थे मेले भी आज सांत्वना का
अनवरत इल्जमातों का श्रृंखला भी थी कहीं राहों में
विलोम हो धैर्य भी पिछवाड़े पे दम भर रहा था
ऐसे में विसंगतियां गले लगने को आतुर सी थी
चरित्र और संस्कार आज परीक्षा को था
और विपरीतता हमेशा की तरेह 
माहौल सजा रहा था ।।
मनुज पुत्रों की ये वैर अब
सहिष्णुता को शिथिल कर रही थी
दंभ धर्म और जातीय जातकों का 
अभ्युदय होने लगा था
और एक अलग व्यापर का 
नापाक शुरुआत हो चुकी थी
मानवता अब पथभ्रमित हो आसमान निहार रहा था
प्रेम भी आवेशित हो अन्धकार में ससेंध मार रहा था
और निजता शीर्ष पर बैठ तांडव।।

Sunday, October 11, 2015

फिर से मैं लौटूंगा

      "फिर से मैं लौटूंगा"
फिर से मै लौटूंगा, उसी प्रवालो में
उसी ठिकानों में उसी बहानों में
उस रंगीन सी तेरी पुरानी सी चादर में
जहाँ ढूंढूंगा मैं खुद को तेरी निशानी में
अपनी सदा से तेरी मेहरबानी में
विश्वास की बेला में, विमुक्त सी आंखों में
वो तेरी अदाओं में,अजनबी सी बातों में
वही अक्स फिर से मैं आँखों में डालूँगा
फिर से मैं लौटूंगा .....
फिर से मै लौटूंगा तेरे ही तरानों में..
उसी ठिकानो में उसी बहानो में
तेरी उसी बरुना के उलझन में
तेरे उस प्रेम के ब्रह्माव के साये में
प्रमोदी प्ररोचन उसी केसुओं में
उस निशेश, निशिथ, निशाबल की बाँहों में

फिर से मैं लौटूंगा तेरी ही बाँहों में
उसी ठिकानो में उसी बहानो में।।।



Sunday, March 22, 2015

"भक्क् जिंदगी..."

व्यंग जब जिन्दगी से हो तो साला सारी व्यख्यान और ज्ञान कहीं घुसर जाता है। आज साला हमको भी पिछवाड़े के आयने ने अपनी अनुवांशिक हिंदी में कुछ लिखने को मजबूर किया।और हमने खुद को ही लिखना पसंद किया,अपनी जिंदगी को।
हम आज भी अपने अतीत को ही जीने की कशमकश में लगे हैं और पूरी दुनिया भविष्य को।
हमको आज भी याद है की हम भी साला कभी कुछ बन जाने का सपना देखते थे, हमलोग भी कभी राज कैंपस के पोखरा के सीढियों पर बैठ कर अपने ज्ञान की रागनी गाया करते थे और फिर घर आकर खा पि कर सो जाते थे। आलम ये था की हम कभी भी किसी से खुद को पीछे नहीं समझते थे, थे साला डेढ़ फुट के और बख्थोती हम से रूकती नहीं थी। बस एक ही वाक्य याद है आज भी जिन्दगी के की "वचनम् किं दरिद्रता" और हम साला इसी बात को चरितार्थ करने हेतु पुरे दिन  फुटानी करते फिरते। हमको लगता था की दुनिया के सारी लड़कियां हम पे ही मरती है और हम साला लिलिपुट होते हुए भी कोई अमिताभ बच्चन से कम थोरे न थे।
एक मित्र था विवेक जो साला हमेशा "मारबे ..मारबे" का रट लगाये रहता,एक बी2 जो साला उठता तो बगले खुजाता था मगर साला स्टाइल में अपने आप को हॉलीवुड स्टार समझता था,रही बात सुभाष की तो वो बिना पूछे ही ज्ञान बांटते फिरता था।विक्की,अजीत ,बजरंग और आनंद सभी हमारी तरह रेस के घोड़े बनने की होर में थे। मगर हमारी दोस्ती उस समय निर्दोष और निश्छल थी और हम साला ओवर स्मार्ट।
आज ना तो कोई दोस्त है और ना हम किसी के शागिर्द। साला हर कोई अपने गांड में रखे attitude को सुबह बिना निकाले घूम रहें हैं,हम भी उन्ही में से शामिल हैं।और अपने आपको श्रेष्ठ मान कर गुम हैं कहीं किसी होर में,मारा मारी में।
और साला हम इधर पिछड़ गए उनसे रेस में तो बस पीछे ही रह गए। अब ना तो कोई पीछे से आवाज देने वाला है ," रे भास्करिया" न ही साला कोई अब ये कहता है की घंटा लिखता है तुम, ना कोई हमारे बकवास पर ये कहता है की, भाई अल्हुआ लेबे।
इस बात का दुख आज भी नहीं है की हम पीछे रह गए मगर आज भी राजनगर और स्कूल की बातें यादआती है तो बस यही लगता है की वो जिन्हें सीढियों पे भी दौर लगाना था वो लगा चुके,और उचाईयों की छत पर खड़े हो कर आश्मान को निहार रहे हैं ,निहारते रहें मगर यदि कभी निचे झांक कर वो देखें तो मुझे जरूर ढूंढे,मुझे अच्छा लगेगा। लेकिन साला कोन कहता है की दूरियां नजदीकियां बढाती है यहाँ तो फासले की हद ही नहीं है।
भक्क साला ये जिन्दगी भी कोन कोन सा नखरा दिखाती है, और हमें साला पिछवाड़े की गरम सुर्ख हवाओं की तरेह छोड़ जाती है जिसे ना तो कोई पसन्द करता है और ना कण्ट्रोल।

Monday, February 23, 2015

विचार-1 ( व्यथा और संवाद )

आस्थाओं का कोई धर्म नहीं होता और संस्कार प्रकृति विहीन है होता।हर मजहब इन्सानी है और हर इन्सान में प्रकृति।
मेरी व्यथा अब इन्सान होने मात्र से है। काश इश्वर भी इस रंगमंच पर इंसानों को भी नेपथ्य से आवाज दे पाता।
अब आंशुओं में भी मुझे व्यथा का अभिसार या चरम सुख की ख़ुशी नहीं दिखती। यह तो अब निरंतर निर्झर नदी के माफिक शाश्वत और गुंजायमान है। जिसका शोर इन्सान के मुख से और निरंतरता आँखों से कहीं भी परिलक्षित हो जाती है इस धरा पर ,और बहूत आसानी से आपको अपने मानव विकाश के अग्रशिलता पर खीस दिलाती है और आपको भयाक्रांत कर देती है।
मैंने आज कुछ ऐसी घटना देख ली जो मुझे झकझोर कर रख दी है,मेरा अंतर्मन और आंतरिक मस्तिस्क का साहचर्य विलोपित है। मैं अजीब अवस्था में खुद को पा रहा हूँ ।
आज कुछ लोग एक बेहद वृद्ध महिला को पीट रहे थे , बिलकुल बुरी तरेह क्युकी वो किसी के दुकान से एक समोसा चुराते हुए पकड़ी गयी थी। जबतक लोग उस व्यक्ति तक पहुचते रोक थाम करने की पहल करते , उस वृद्धा को उन व्यक्तियों ने जमींदोज कर दिया था,वो जमीं पर कराह रही थी। बाद में हम जैसे कुछ भीड़ उन्हें अस्पताल तक छोड कर आए। और अस्पताल में मैंने देखा जो इस्थिति वो और भी हृदय विदारक था। उफ्फ्फ..भगवान ही मालिक था वहां का...

इश्वर ने इस संसार में न जाने कैसे कैसे आलेख लिख रखें हैं और नाटक रच रखा है। मुझे तो अब इश्वर के इस रंगमंच पे पात्रों की पात्रता बिलकुल ही असहज और अविवेकी लग रहा है अब। अब इश्वर जो भी तर्क दे कर इसे कहानी की सत्यता या अपने नाटक के पात्रों का पक्ष रखें मुझे स्वीकार्य नहीं होगा। ये कैसा किस्सा और आलेख है ,और कैसा निर्देशन है जहाँ पात्र को अपने संवाद और अभिनय का कोई समझ ही नहीं है और ना ही नेपथ्य से उसे अपनी रंगमंच की पात्रता का मार्गदर्शन कर रहा है।
हे इश्वर आपके इस रंगमंच पर बिलकुल ही अस्तव्यस्तता है,आपके पात्रों को आपके दिए गए निर्देशों की कोई परवाह नहीं है,सभी अपने मर्ज़ी से अपने पात्रता को सिद्ध करने के होर में है और आप फिर भी चुप हैं। खेद है मुझे ये कहते हुए की जो भी सही अभिनेता हैं आपके रंगमंच पर वो आज मूक हैं और आपके चहेते धर्म निर्देशक आज कल समाज से अलग हो बाजार पर ध्यान केन्द्रित कर के बैठे हैं। और उधर आप भी पता नहीं किस लीला में व्यस्त हो।
कुछ जल्दी करो वरना ये सारा का सारा आपका रंगमंच एक व्यथित कोलाहल या निःशब्द चुप्पी में तब्दील होने वाली है।
मेरी ये मानसिक अवस्था स्वाभाविक है क्यूंकि चिंता अब चिंतन में तब्दील होने लगी है और मुझे मेरी प्राकृतिक स्वभाव को सामाजिक और व्यवहारिक पटल पर परिवर्तन को सूचित और इंगित कर रहा है। मै अब परिवर्तन हूँ और क्रिया अब परिवर्तित है। जिंदगी की इस तीक्ष्ण घुमाव पर इस्थिर गति एक सुरक्षित प्रतिक्रिया हो चुकी है, और अब हम सब को इसका प्रतिकारक बनने की जरूरत है।
धन्यवाद