Monday, October 9, 2017

शितरक्त

"शितरक्त"
छुपा था वो आसमानों में कहीं
आकाशगंगा में या ब्रम्हांड में कहीं
दुविधा थी सजग,कहीं आसमानों में
लहरों में या बादलों में कहीं
कहाँ गुम है वो सजग प्रहरी
यह यक्ष प्रश्न विस्तारित था
हर पल मस्तिष्क और पटल पर कहीं
चल-अचल विश्वास में थे सब
देर और अंधेर की मुहावरों में कहीं
लौट आने में युग की क्यूँ देरी
विशेष और विनिमय का क्यूँ अपेक्षा
पहल तुम्हारी ही है इश्वर
फिर ये सांत्वना और समय का क्यूँ है रेखा
क्या ये चरम विशेषण विषमय की
काफी नहीं
जो अन्याय और विवेक का क्षय और निम्नतर हो ?
कब तक बहुब्रिह समास का सदुपयोग विपदा में हो ?
कब तक हम रहें रक्तमय और अश्रुलिप्त हो ?

अरे निर्णायक ..निर्णय की घड़ी को तीव्र करो अब
जरा आँखे फेरो अब ,मत रहो अब और मुक्दर्शी
छोड़ो निष्ठुरता को, मत बनो तुम भी शितरक्त अब....

भास्कर

Saturday, October 7, 2017

"माँ " और "मैं"

माँ,
ये उन सैकड़ो पत्र में से एक है जो मैं आपको अपने अकेलेपन में लिखता रहा हूँ। और खुद ही पढ़ कर उससे प्रेरणा लेता रहा हूँ। और आज फिर एक बार आपसे पत्रान्तर करना चाहता हूँ।
माँ, मुझमे कभी भी इतनी चेतना नही रही की मैं अपने संवेदनाओ को आप तक पहुँचाऊ और आपको भी अपने अंतर्मन की आवाज़ से रूबरू होने दू।
एक अजीब सी पसोपेश में रहा हूँ मैं सदैव,मुझे जिंदगी के अनसुलझे हर परिस्थिति में वैचारिक , शैक्षणिक  सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक ,और व्यावहारिक मार्गदर्शन आप से और पिताजी से ही मिलता रहा है। पर मैं आज पेशोपेश में हूँ, कई सवाल खड़े हो रहें हैं मन में ? सत्यता और उसकी वास्तविकता को ही अब मन स्वीकार करने को राजी नहीं है !! या वो सत्य है भी की नहीं, उसी पर मष्तिष्क ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया है ??
आपने हमेशा ही सिखाया की हर चीज को सकारात्मकता से देखो , जिंदगी सैदेव संजीदा और खुशहाल रहेगा, सोच में कभी द्वेष और वैमनष्य नहीं पनपेगा । आपने ये सिखाया की परिस्थितियां हावी नहीं होती मानव पर , बल्कि मानवीय अकर्मण्यता परिस्थितियों को ज्यादा बल देती है हावी होने को। आपने ये भी कहा की ईश्वरीय विश्वास और आराधना मौलिक विचारधाराओं को ठोस बनाती है और आत्मविश्वास को शदैव जिवंत रखता है।
मैंने हर वो बात मानी अब तक आपकी जो आपने सिखाया, इसीलिए नहीं की माँ ने कहा इसीलिए , बल्कि इसीलिए की मैंने उसे व्यवहारिक और तार्किक तौर पर अजमाया और उसे सभी मापदंडों पर उत्तीर्ण पाया, और वैसे भी आपने ही तो कहा था की हर तर्क को अपने व्यक्तित्व और परिस्थिति के हिसाब से अपनाने को, आपने ही कहा था आँखे मूंद कर विश्वास करने वाले लकीर के फ़क़ीर होते हैं। सवाल करने वाले ही जवाब देने योग्य बनते हैं, इसलिए सवाल बहुत ही आवश्यक और अनिवार्य है !!
आज सवाल शायद खुद से नहीं है, लेकिन विश्वास की वो अनवरत मालाओं से है, जिसने  उँगलियों पर सशब्द परिक्रमा की है, शायद  अनगिनत बार।
आज सवाल उन सभी प्रत्यक्षदर्शियों से है ,सभी साक्ष से हैं जो  उपासनाओं में सदैव उपस्थित रहे। मैं यदि आस्तिक हूँ तो शायद मेरा ये संवाद और प्रश्न उन सभी कड़ियों से पूछना आवश्यक हो जाता है जो उपासना की श्रीखंलाओं में मौजूद रहे और उसका साक्षी भी।
मैं पूछना चाहता हूँ उस आसन से, जिस पर बैठ ईश्वरीय सानिध्य से रूबरू हुआ करते थे,  उस अग्नि से, प्रत्यक्ष सूर्य से  जिसके सम्मुख कई वर्षों तक सभी अर्घ्य दान करते रहें हैं, उस तुलसी से, उस ईश्वरीय प्रतिरूप और गंगा जल से पूछना चाहता हूँ, की क्या इन साधनाओं और विश्वास का ये फलसफा कहीं कुछ अजीब या गलत तो नहीं है !! मुझे पता है जवाब का स्वरुप मुझे ही ढूँढना है और मैं इस इस्थिति में नहीं हूँ की अब भी सकारात्मकता की लँगोट पहने हर चीज़ को तर्कसंगत लेता रहूँ। मेरा तर्क और मेरी अवस्था अब प्रकृति की संरचना को ही यथार्थ मानने से इनकार कर रही है, मैं अब विश्वास की उस धर्म शास्त्र को भी चुनौती देता हूँ जो मेरे अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। मैं न तो आस्तिक हूँ और न ही नास्तिक बल्कि दोनों शब्दों के यथार्थ के पीछे लगे प्रश्न चिन्ह "?" हूँ !! और ये प्रश्न चिन्ह उसकी सरभौमिक्ता , सर्वस्ता और सर्वशक्तिमान को चुनौती है। यदि वो ये अपेक्षाएं रख रहा है अब भी की मैं मन्नतें माँगने अब भी आऊंगा तो शायद वो अपनी उपस्थिति को और भी मलिन करने पे तुला है।।

माँ, मैं क्या करूँ, इस अंतर्द्वंद का आरंभ और अन्त पता नहीं चल रहा। मैं भी उसी "गोलंबर" को निहार रहा हूँ जो जिसे कभी "रतन" निहारा करता था !!
मेरी वस्तुस्थिति भी उससे अलग नहीं है, मैं भी अपने परिधि की केंद्र बिन्दु को विलोपित तो नहीं पर अनाशक्त देख रहा हूँ। मैं देख पा रहा हूँ की मानवीय परिकल्पनाओं का सर्वशक्तिमान भी अपनी परिधि को संकुचित करता जा रहा है, और अपनी मौलिक संकल्पनाओं के अवशेष को गौण ! मैं ऐसे में किंगकर्तव्यविमूढ़ सा बस आसमान को निहार रहा हूँ। आसमान में उस शरद पूर्णिमा के दिन भी तारें गिन रहा हूँ। मुझे रास्ता नहीं सूझ रहा, हर सड़क संकीर्ण नजर आ रहा है और दूर कहीं एक आशा और निराशा के बिच की दुविधा दिख रही है...दूर तक...।।

भास्कर

Thursday, September 14, 2017

अंतर्विरोध

मैं कुछ कहता, तो बात थी
निःशब्द चुप्पी भी मेरी, उसे मेरी वाक्यों से रूबरू कर देती है
अजीब इतेफाक है..आज शब्द गौण और चुप्पी मुखर है

लो ये क्या हुआ..शोर उठने लगा..
उफ़ आन्तरिक व्योम भी एक अब्द के बाद चरित्र बनने लगा
साहसिक कदम अब ठिठक मस्तियाँ करने लगी
विचार विरोधक और सहिष्णुता अवरोधक सी प्रतीत होंने लगी
लो ये क्या हुआ ..फिर से शोर उठने लगा..

अरे जरा देखो तो दर्पण को, ये श्याही कैसी?
सामाजिक विरोध का कालिख तो नहीं..?
हाँ जरूर ये प्रतिबिम्ब प्रकाश के विलोम सा ही तो है!!
इतिहास और प्रेरणा की स्वर्णाक्षर विलोपित हो,बिन्दुबत हो रहा है
पकड़ो इस की परिधि को, जरा विस्तारित करो
नहीं ये स्वविस्तार की सक्ल्पना है..ऐसे नहीं विस्तारित होगा
ढूँढना होगा तुम्हे.. फिर से ..विस्तार से..परिभाषा को..सच्चाई को
आज फिर से अंतर्द्वंदो को सतेह पर लाना होगा
नहीं तो ये शोर उठते रहेंगे..अनन्त तक........

लो चल पड़ो अकेले..डगर की आपाधापी में..
निःशब्द ..मुखरता और विविचेना की सीधी लकीर पर..
चलते रहो उन पर ही अनंत तक..
शायद कल को शोर थम जाये...

भास्कर

Saturday, September 9, 2017

"आदेशों का अनुपालक"

मैं आदेशों का अनुपालक हूँ
कार्य नियंत्रण क्या करना
जब शाम सवेरे पहरे दूँ
तो आत्म निमंत्रण क्या करना?
जब उर्द्ध पतन,छैतिज अवलोकन
विषम परिस्थिति आती है
प्रत्युत्तर का सवाल नहीं तो
फिर आत्मनिरीक्षण क्या करना?
बैठे परे जब मनः इस्थिति
निज सुसुप्तता भी हो नभ् में
आत्मविवेचन पे सवाल खड़ा जब
आत्ममंथन फिर क्या करना?
मैं नभचर जब आशक्त पड़ा
धरा पर मैराथन करने को
आशाओं का दीप कहीं ना
वृक्ष शाखा पर रहने को
"पर" हैं पर कोई औचित्य नहीं
फिर आत्मविश्वास का क्या करना?
मैं आदेशों का अनुपालक हूँ,
फिर कार्य नियंत्रण क्या करना !!

भास्कर

"आधी आबादी का सच"

आधी आबादी के सच की ये दुनिया
शताक्षी,शाम्भवी और ज्ञानदा की दुनिया
शक्ति,संस्कृति और तहजीबो की दुनिया
ये न हों तो जाने क्या हो ये दुनिया
सोचो जरा  तब माँ स्वयं है एक दुनिया
"कल्पना", इंदिरा और सायना की दुनिया
महादेवी,सुभद्रा और अमृता की दुनिया
कविता ,कहानी,अलंकारों की दुनिया
लक्ष्मी,चंडी और वीरांगनाओं की दुनिया
वसुधा,प्रकृति और शक्ति की दुनिया
आभा,प्रतिभा,प्रज्ञा की दुनिया..
जागृति, शिवांगी, और प्रकृति है दुनिया
सर्वस्वा, स्वयंभू और एकाकी सी दुनिया
चरित्र,सम्मान और अहंकारा की दुनिया
चिर धरा,मातृत्व,और आपसे ही ये दुनिया।

भास्कर

"माँ"

ऊन के लिपटे गोले
और तेज हाथों से चलती वो
दो कांटे..
और भागता मैं,
ऊन के गोले ले कर
और वो मगन,अपने धुन में
बुनती स्वेटर..
मानो जैसे गढ़ रही हो
हमारे रक्षा की लिबास
बरबस ही याद आ जाती है जब
दस्तक देती ठण्ड ,बदन को सिहरा देती है ,आज

तब गुम हो जाता हूँ कहीं मैं
उनके ममत्व और वात्सल्य में
खोने लग जाता हूँ कहीं
अपने होने के पर्याय में
और पारदर्शी प्रेम के असीम ब्रह्मांड में
तब पलट कर देखता हूँ मैं,अतीत की चारदीवारी को
और पढ़ने लग जाता हूँ, उन अनगिनत
शब्दावली को, जो रेखांकित करती
मेरे अस्तितव के ज्यामिति को...
और वो सदैव विद्यमान दिखती मेरे परिधि के
दूसरे छोड़ पर, विस्तारित करती
मेरी जीवन के व्यास को निरंतर..

भास्कर

Sunday, September 3, 2017

"सामाजिक मनोविज्ञान और हम"

लो कर लो बात, फिर से तुमने आवाज उठाई तो, हँस पड़े लोग,। और तुम लोगो की सोच कर चुप लगा बैठे मायूस हो कर।।
शिक्षा जो तुमने ली, जो किस्से जो कहानियाँ पढ़ी ,जिसे पढ़ा कर लोगो ने सीख लेने को कहा, अगर वही बात जीवन में करने की कोशिस की तो लो हो गया ,तहजीब की ऐसी की तैसी !!
ये सामाजिक संस्कार,ये संस्कृति , ये ठगा सा व्यवहारिक व्यवस्थाएं जकड़ी हुई है, मानसिक विपन्नता से, एक दूसरे के उपहास से और तानों से। मैं जब भी आँखे मिच कर देखता हूँ तो बस एक ढोंग और खोकली सी चादर ताने तम्बू दिखता है, जो न तो ठीक से धुप से बचाती है और न बारिश से।
अजीब सा किस्सा है, कुछ न करो तो उपहास और कुछ कर दिखाने का जज्बा दिखाओ तो निचे दिखाने वाली हँसी। कैसे चल पायेगा ऐसे !! बस आँखे मूंद कर जपते रहो उनका नाम ,पूजते रहो उन्हें, पढ़ते रहो बस उन्हें किताबों में और चार पंक्तियों की भावार्थ,उपसंघार और अलंकारों की चासनी में उन्हें लपेट कर परीक्षा में उत्तीर्ण होते रहो, यही नियति है तुम्हारी।। अब नियति की भी क्या है, परिवेश देख कर गिरगिटिया रंग बदल लेता है। अजीब पेशोपेश है इस सांसारिक, सांस्कृतिक ,सामाजिक जीवन में। यदि इसे देख कर घबराओ तो फट्टू और लड़ने की जिजवषा दिखाओ तो ओवर स्मार्ट !! हद है यार..सोचो कुछ नया तो खयाली पुलाव और यूँ ही आदेश वाहक बने रहो तो पिछलग्गू !!
यहाँ पुरषोत्तम राम, श्री कृष्ण और त्रिलोकी शिव के सामने सर झुकाने की अनुमति है, उनके जीवन ,उनके चरित्र को जीवन में उतारनेे की नहीं। यदि आपने ऐसा करने की भूल भी की तो सारे सामाजिक ताना बाना बिगाड़ने की आपने पहल की है। यदि श्री राम के चरित्र से आपने स्त्री , पत्नी के सम्मान और उसके विचारों को तहजीब दी तो आप पत्निव्रता, यदि नहीं दी तो आप व्याभिचारी। आपने कृष्ण की तरह प्रेम शब्द को जीवंत करने की कोशिश की तो छिछोड़ा, सच मानों तो आप बस कृष्ण की लीलाओं का आनन्द ले तो सकते हो, उन्हें सुनकर आह्लादित तो हो सकते हो ,लेकिन उन्हें जीवन में नहीं उतार सकते। यहाँ  यदि सर झुकाये रहो तो व्यवहारिक और सर उठा कर चलो तो घमंडी ।।
यहाँ न तो जियो और ना जीने दो।। फिर तो आपकी सामाजिक जिंदगी  उत्कृष्ट है।। और कोई भला मानुस इन सबसे लड़ के कुछ कर जाये तो उसे बस पढ़ते रहो पाठ्य पुष्तक में। लेकिन कुछ करो मत अकर्मण्य बने रहो, आँखे मूंदे रहो बस।
यदि किसी की मदद करने का समय आये तो आप "दूसरे के काम में टांग नही अड़ाते ", और खुद समस्या में हैं तो पूरी दुनिया "स्वार्थी".
यदि आप हमारे समाज के इन व्यवस्थाओं और मानवी संकल्पनाओं को देखेंगे,पढ़ेंगे और सोचेंगे तो आप क्या पाते हैं अपने इर्द गिर्द ? सिर्फ नकारात्मक माहौल और कुछ नहीं। यदि आप कुछ और नजदीक जा कर देखेंगे तो पाएंगे की ये दुबिधा इसीलिए है की हमारी समाज की परिधि "मैं" में सिमटी पड़ी है," मैं "से " हम "तक का सफ़र कोई तय ही नहीं कर पा रहा । हर कोई एक दूसरे को देख कर अपनी इस्थिति को आँकता है बस यही है सब कुछ का जड़ !! लोग ये कहेंगे, लोग वो कहेंगे.....पता नहीं लोग क्या कहेंगे ... और लोग हैं कौन? आप भी तो हैं उनमे, या आप उन लोगों में नहीं हैं? आप उन्ही में से एक हैं, इसीलिए आप भी लोगों से भयभीत है , और आपको लोगो की वाहियात सोचों की फ़िक्र है, अन्यथा किसी को मुश्किल में आपने हाल तक नहीं पूछा कभी, और आज आप को समाज और लोगों की फिकर है।।
हाहाहाहा अजीब हास्यास्पद इस्थिति है, और इस इस्थिति में परिस्थितियों में आप बस गौण हैं, अंग्रेजी के साइलेंट वर्ड की तरह, जहाँ आपकी उपस्थिति तो है लेकिन कोई महत्व नहीं।। बस आप हैं , ये मान कर चलिए । और बस चलते रहिये बिना सोचे समझे भेड़ चाल में, फिर आप सभ्य भी हैं,सामाजिक भी और व्यवहारिक भी।
मैं बस इतना बोलना चाहता हूँ की सोचिये जरा और परिवर्तन बनिए, परिवर्तित बाद में कीजियेगा , शायद आपकी पहल स्वतः परिवर्तन लाये।।

आपका
भास्कर