Saturday, October 7, 2017

"माँ " और "मैं"

माँ,
ये उन सैकड़ो पत्र में से एक है जो मैं आपको अपने अकेलेपन में लिखता रहा हूँ। और खुद ही पढ़ कर उससे प्रेरणा लेता रहा हूँ। और आज फिर एक बार आपसे पत्रान्तर करना चाहता हूँ।
माँ, मुझमे कभी भी इतनी चेतना नही रही की मैं अपने संवेदनाओ को आप तक पहुँचाऊ और आपको भी अपने अंतर्मन की आवाज़ से रूबरू होने दू।
एक अजीब सी पसोपेश में रहा हूँ मैं सदैव,मुझे जिंदगी के अनसुलझे हर परिस्थिति में वैचारिक , शैक्षणिक  सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक ,और व्यावहारिक मार्गदर्शन आप से और पिताजी से ही मिलता रहा है। पर मैं आज पेशोपेश में हूँ, कई सवाल खड़े हो रहें हैं मन में ? सत्यता और उसकी वास्तविकता को ही अब मन स्वीकार करने को राजी नहीं है !! या वो सत्य है भी की नहीं, उसी पर मष्तिष्क ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया है ??
आपने हमेशा ही सिखाया की हर चीज को सकारात्मकता से देखो , जिंदगी सैदेव संजीदा और खुशहाल रहेगा, सोच में कभी द्वेष और वैमनष्य नहीं पनपेगा । आपने ये सिखाया की परिस्थितियां हावी नहीं होती मानव पर , बल्कि मानवीय अकर्मण्यता परिस्थितियों को ज्यादा बल देती है हावी होने को। आपने ये भी कहा की ईश्वरीय विश्वास और आराधना मौलिक विचारधाराओं को ठोस बनाती है और आत्मविश्वास को शदैव जिवंत रखता है।
मैंने हर वो बात मानी अब तक आपकी जो आपने सिखाया, इसीलिए नहीं की माँ ने कहा इसीलिए , बल्कि इसीलिए की मैंने उसे व्यवहारिक और तार्किक तौर पर अजमाया और उसे सभी मापदंडों पर उत्तीर्ण पाया, और वैसे भी आपने ही तो कहा था की हर तर्क को अपने व्यक्तित्व और परिस्थिति के हिसाब से अपनाने को, आपने ही कहा था आँखे मूंद कर विश्वास करने वाले लकीर के फ़क़ीर होते हैं। सवाल करने वाले ही जवाब देने योग्य बनते हैं, इसलिए सवाल बहुत ही आवश्यक और अनिवार्य है !!
आज सवाल शायद खुद से नहीं है, लेकिन विश्वास की वो अनवरत मालाओं से है, जिसने  उँगलियों पर सशब्द परिक्रमा की है, शायद  अनगिनत बार।
आज सवाल उन सभी प्रत्यक्षदर्शियों से है ,सभी साक्ष से हैं जो  उपासनाओं में सदैव उपस्थित रहे। मैं यदि आस्तिक हूँ तो शायद मेरा ये संवाद और प्रश्न उन सभी कड़ियों से पूछना आवश्यक हो जाता है जो उपासना की श्रीखंलाओं में मौजूद रहे और उसका साक्षी भी।
मैं पूछना चाहता हूँ उस आसन से, जिस पर बैठ ईश्वरीय सानिध्य से रूबरू हुआ करते थे,  उस अग्नि से, प्रत्यक्ष सूर्य से  जिसके सम्मुख कई वर्षों तक सभी अर्घ्य दान करते रहें हैं, उस तुलसी से, उस ईश्वरीय प्रतिरूप और गंगा जल से पूछना चाहता हूँ, की क्या इन साधनाओं और विश्वास का ये फलसफा कहीं कुछ अजीब या गलत तो नहीं है !! मुझे पता है जवाब का स्वरुप मुझे ही ढूँढना है और मैं इस इस्थिति में नहीं हूँ की अब भी सकारात्मकता की लँगोट पहने हर चीज़ को तर्कसंगत लेता रहूँ। मेरा तर्क और मेरी अवस्था अब प्रकृति की संरचना को ही यथार्थ मानने से इनकार कर रही है, मैं अब विश्वास की उस धर्म शास्त्र को भी चुनौती देता हूँ जो मेरे अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। मैं न तो आस्तिक हूँ और न ही नास्तिक बल्कि दोनों शब्दों के यथार्थ के पीछे लगे प्रश्न चिन्ह "?" हूँ !! और ये प्रश्न चिन्ह उसकी सरभौमिक्ता , सर्वस्ता और सर्वशक्तिमान को चुनौती है। यदि वो ये अपेक्षाएं रख रहा है अब भी की मैं मन्नतें माँगने अब भी आऊंगा तो शायद वो अपनी उपस्थिति को और भी मलिन करने पे तुला है।।

माँ, मैं क्या करूँ, इस अंतर्द्वंद का आरंभ और अन्त पता नहीं चल रहा। मैं भी उसी "गोलंबर" को निहार रहा हूँ जो जिसे कभी "रतन" निहारा करता था !!
मेरी वस्तुस्थिति भी उससे अलग नहीं है, मैं भी अपने परिधि की केंद्र बिन्दु को विलोपित तो नहीं पर अनाशक्त देख रहा हूँ। मैं देख पा रहा हूँ की मानवीय परिकल्पनाओं का सर्वशक्तिमान भी अपनी परिधि को संकुचित करता जा रहा है, और अपनी मौलिक संकल्पनाओं के अवशेष को गौण ! मैं ऐसे में किंगकर्तव्यविमूढ़ सा बस आसमान को निहार रहा हूँ। आसमान में उस शरद पूर्णिमा के दिन भी तारें गिन रहा हूँ। मुझे रास्ता नहीं सूझ रहा, हर सड़क संकीर्ण नजर आ रहा है और दूर कहीं एक आशा और निराशा के बिच की दुविधा दिख रही है...दूर तक...।।

भास्कर

2 comments:

Sports global news and updates said...

Wah Saab wah

Ashish Saxena said...

Acha laga ....dil ko chuu se gaye tere ye vichaar