Sunday, January 21, 2018

कोमल किशलय के अंचल में

"कोमल किशलय के अंचल में"

उतश्रृंखल नयन गहन विषाद में
तड़पता मन सुख अंचल आश में
विस्मृत तन-मन सूखे आषाढ़ में
बह चला कहीं अनंत वियाग में

मैंने पाया स्वतृष्णा को
        उदमत् गृह आस पास में
मय मय था सानिध्य उसका
        रचता बसता उस गृह पास में
मधुशाला का नाम न लेना
         वह भी कम था उस गम आवेश में
गिरता पड़ता बरबस ठहरता
         लोप था वह "उसके" संग में
ठहरी रूप उन्मत यौवन था
          काम -पाश भी थी अंग अंग में
देखा जब उसने मधुहारी
          उस यौवन को पराये संग में
जिन्दा वियोग, मृतप्राय कामसूत्र
           नश नश स्थूल था अब उसके जीवन में

काम तृष्णा या प्रेम संचरण
        पता नहीं क्या था उसके मन में
ढूँढता खुद को अतृप्त गगन
        संसृत आगार, विस्मित मन में
प्रेम था या रहा आकर्षण
         परिभाषा ढूँढता वह अपने मन में
वियोगी कहलाऊं या कहलाऊँ पागल
          यही ठहरती थी अब उसके मन में

प्रेम निर्वात या शून्य था वो
          गगन अदृश्य एक ब्रह्म में
नितांत एकांत के अश्वरथ पर
          बैठ चला था वह प्रेम अगन में
बैठी काया, निर्मल मन था
           जैसे पंकज निर्मल जल में
हाय, विरह के संवेदित स्वर से
           गूंजता हर पल वह स्थिर पवन में

दुःख दरिया की निंदित काया
           प्रेम पाश के विहरित अस् में
घूँट रहा रहा था वह पल पल
            जैसे जठरनाल भूखे उदार में
हाय "रे" प्रेम की वह अभिलाषा
            जल रही थी तुमुल विकल में
बून्द बून्द कतरा आँशु के
             तापश प्रेम अनन्त विरह में

ढूंढा जब उसने वह अक्स नयन में
              खड़े होकर उस निज दर्पण में
पाया उसने समवेत निशा को
              झिल-मिल झिल-मिल ज्योतिर् तन में
नित-नित कर्म जैसे वो भास्कर
              खड़ा था वो मानो मरुस्थल में
वियावनि संसर्ग और विहरित काया
               ढूंढ रहा था वह उस दर्पण में

ढूँढता रहा वह प्रेम परिभाषा
                चारि तरफ वह अपने अंतर में
प्रेम शाश्वत या प्रेमी शाश्वत
                 उथल पुथल थी अब उसके मन में
वह सोचता रहा यूँ ही मगन में
                 हाय तू क्यों आई मेरे जीवन में
कितना अच्छा एक प्रवार था मैं
                 अब शीतरक्त हूँ ,जैसे जीवन में

जीने दे अब तू मुझको
                  एक नहीं सौ सौ दीपक में
ढूंढते रहना अब तुम खुद को
                  इस अप्रेम विरह के वियागी विश्व में
मैं जनता हूँ, ज्योति नहीं निशा सत्य है
                  लेकिन फिर मैं जीता "भास्कर" के तन में
ज्योतिर्मय होगी कम से कम जीवन
                   "कोमल किशलय के उस अंचल में"

भास्कर

Tuesday, January 16, 2018

"क्या कोई माँ कहके के बुलाता है"

क्या वहां पर भी आपको कोई माँ कहके बुलाता है
पुत्र स्नेह का माया क्या वहां पर भी धाता है
जब ईश्वर आपसे पूछते होंगे, कुछ बतलाओ अपने बारे में
आप जरूर निःशब्द हो जाती होगी, संतति स्नेह के साये में
चर्चा वहां भी होती होगी, आपके वात्सल्य की गाथा की
प्रेम, स्नेह और ममत्व के आश्चर्यजनक परिभाषा की
मेरे चर्चे होने पर, हँसी के फव्वारे तो छूटे होंगे
नादानी के मेरे विषयों पर, सबने मुश्कान बिखेरे होंगे
बात जब आती होगी भैया की,आदर्श जरूर रेखांकित होती होगी
एक विशेष परिभाषा से रिश्तों की संज्ञान गढ़ी गई होगी
पुत्र हो या भ्रातृ स्वरुप वो हर रूप में नया युग लिख जाते हैं
आपके संस्कारों को मानो अंतर्मन में धा जाते हैं।
आप ये सब देख कर बस प्रेमभाव मुस्काती होंगी।।
हमारे वर्तमान के अवलंबों पर आशीष तो धाती होंगी !!

ईश्वर भी ये सब सुन कर अचंभित तो जरूर हुआ होगा
अपने सृजन के इस स्वरुप से , आत्ममुग्ध तो रहा होगा
पिताजी का वो इस्थितिप्रज्ञता उन्हें स्वयम् स्वरूप तो लगा होगा
आपका संघर्ष और समर्पण एक युग व्यतीत रहा होगा
मैं मानता हूँ , तभी ईश्वर भी इतना स्वार्थी बन गया होगा
आपको हमसे दूर ,निज के सानिध्य में ले गया होगा।
वो जरूर जलता होगा हमसे , जो आपको छीन ले गया हमसे
लेकिन ऐसा करके वो जरूर स्वयं से हार गया होगा
बता देना आप उनसे, हम दूर कहीं न जायेंगे
हम उसी राह पर चलकर अप्रितम इतहास बनाएंगे

पर माँ आज भी एक बात मुझे फिर से सताता है
आप सच, सच कहना,
क्या वहां पर भी कोई आपको माँ केह के बुलाता है।

भास्कर

Sunday, January 14, 2018

कुछ कर के दिखलाओ

"कुछ कर के दिखलाओ"

हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

शैशव से ही देखो असीम संभावनाएं
ईश्वर की भी तुम से है
तुम ही हो सर्वश्रेष्ठ चराचर
अपना हुनर तो दिखलाओ
छोड़ो आलस और संकीर्णता को
नब्ज नब्ज में स्फूर्ति लाओ
मत बैठो हाथ जोड़कर
अपनी प्रचंडता तो दिखलाओ
झाँको खुद में एक बार तुम
खुद को ही फिर से पहचानों
अरे ! वत्स तुम मनुज पुत्र हो
मनुजता तो दिखलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

सर्वानंद, सर्वानुभू तुम हो
सर्वाभाव को दूर भगाओ
मानव तुम सर्वोत्तमुख, सर्वांग भी हो
अपना सर्वाधिकार् फहराओ
संसिद्धि तुम्हे गर्भ में मिली है
संस्कारयुक्त भी हो तुम मानव
फिर क्यों आज संस्तंभ पड़े हो
अपनी संस्तुता को फिर से जगाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

मुदिर हो तुम तो क्या हुआ
अब तो मुदगर बन दिखलाओ
मुमूर्षा का भाव त्यागकर
मुमुक्षता तो बतलाओ
मुखापेक्षी मत बनो नर "रे"
मुकुरित, मुखामृत दिखलाओ
मार्दव, मार्मिकता को अपनाकर
अब तो मातंगी बन बतलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

ऋत्विक और ऋतंभरा भी तूम हो
अपनी ऋक्षिका को जगाओ
"हे" ऋक्षेश मानव तुम
ऋत , ऋजुता को अपनाओ
उर्द्धस्थित, उर्ध्वांग हो तुम
प्रज्ञ उर्मि को तो लहराओ
मत रहो उर्ध्वबाहु तुम
उर्ध्वपुंड्र बन बतलाओ
हे मानव मनुज पुत्र तुम,कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

उर्जस्विनी, ऊर्णा के आगोश को छोड़कर
उर्ध्वकेतु बन दिखलाओ
उतकंठिता की व्योम नहीं हितकारी
रोम रोम तुम मत सहलाओ
देखो ! छोड़ो अब इन बाँहों को
अपना उत्तरदायित्व तो निभाओ
हे मानव मनुज वंसज तुम, अब तो कुछ करके दिखलाओ
शिथिल रहोगे कब तक तुम,अब कर्म योगी बन बतलाओ

भास्कर

Monday, October 30, 2017

संवेदनाओं का स्वार्थ

"संवेदनाओं का स्वार्थ"

सावधान से विश्राम की जो ये पहल है
अब कालजयी है,अशक्त है
अभिप्राय से पृथक है
विवेचनाओं से विलग है
भावनाओं की भंगिमा है
और वयम् से अहम् है
ये सब कुछ नहीं बस
निज संवेदनाओं का स्वार्थ है

ये, ये जो अश्रुलिप्त लोचन है
ये ,ये जो रुग्ण रुदन है, ये व्यथा है
व्यवहार जो गौण है, शिथिल है
उदासी जो ये प्रखर है,
ये सम्बन्धों का अभिसार है
आपक्ता का संभार है
और यही संवेदनाओं का स्वार्थ है।

ये, वो जो चली गई जो दे कर
एहसासों का ,ममत्व की, वात्सल्य की गाथा है
ये, ये जो बंधन है, लगाव है
अभिप्राय है अपनत्व का
ये,ये जो उनके खो जाने का यथार्थ है
ये सत्य नहीं है, ये छदम् है
ये, ये जो गौण उपस्थिति है उनकी
ये अमरत्व का प्रमाण है,
और ये, ये जो मेरा संताप है
आत्मचिंता का अभिलेख है
स्वयं का संघार है और निजता का प्रमाण है
ये,ये कुछ नहीं बस संवेदनाओं का स्वार्थ है

ये, ये जो मानवीय लगाव है,संवाद है
संवेदनाएं हैं, भावनायें हैं
ये स्वार्थ निहित है,
ये भी मैं और हम से अभिप्रेरित है
ये ,ये जो जीवन की अभिलाषा है
ये स्वार्थों की परिक्रमा है
शैशव से शव यात्रा तक,
अपेक्षाओं का अवस्थाएँ है
ये, ये जो स्वरुप है सम्बन्धो का
यही स्वार्थ है,
और ये ,ये जो स्वार्थ है,
संवेदनाओं का जननी है
और ये स्वार्थ का संवेदना है
या संवेदनाओं का स्वार्थ है ।।

भास्कर

Thursday, October 19, 2017

अब दीवाली "एक संवाद और निजव्यथा"

दीवाली हमेशा से ही स्याह और काली रही है, इस बार भी कुछ अलग नहीं है। अमावस्या सैदव की तरह ऊर्जावान है और तटस्थ भी। मगर सदैव प्रकाश और उत्साह उसके स्याह को मलिन किये रहता था।
ये दीवाली हमारे लिए कुछ ज्यादा ही घनघोर और रंगहीन सा लग रहा है। वैसे ही जैसे स्याम रंग का प्रकृति है, सारे रंग को अवशोषित करने या अपने में समाहित करने की। ऐसा प्रतीत हो रहा है की ये वास्तविक में हमारे जिंदगी के सारे रंगो को लील लिया हो जैसे। प्रकृति का ये बदरंग दीवाली का शायद कोई विकल्प नहीं है, इसकी कोई क्षतिपूर्ति नहीं है न ही कोई समाधान मगर मानसिक अवस्थाओं पर भी तो कोई जोर नहीं है।
हालांकि प्रकृति की ये अवस्था भी अब ग्राह्य है मगर कई बदलाव के साथ, कई व्यथाओं के साथ , कई अविस्वास और विस्वास के बीच और अर्थ और अनर्थ के द्वन्द के बीच।
बदलाव सदैव जिंदगी को स्वीकार नहीं होता, और ये बदलाव निश्चित ही विध्वंश है हमारी सम्पूर्ण जिंदगी के अध्याय में। विवेचना और आत्मसंघर्ष के बिच की कड़ी का सत्य थोड़ा मुश्किल सा लग रहा है जो अंतर्मन को कचोटता है, उनकी उपस्थितिहीनता को अब भी असत्य मानता है और अब भी भविष्य , भुत और वर्तमान की परिस्थिति को अनुमानित कर अचेतना में है, एक सुगम्य रास्ते की तलाश में है जो अर्थहीन है सभी मायनों में।
गीता का समस्त ज्ञान मानों सिमट सा गया है,और "स्थितिप्रज्ञता" की पहल अनावश्यक सा लग रहा है। और "चरैवेति चरैवेति" की दिक् दृष्टता हिलकोरे लेते दिख रहा है कहीं बिच भँवर में।
संवेदना, भावुकता और सम्बन्धो के बिच की कड़ी इस गृहस्ता आश्रम का मूल है जो सामाजिक,सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है जहाँ पर इस लोक और परलोक की सारी परिकल्पनाएं क्षीण लगता है और कृष्ण का अर्जुन के  साथ का संवाद तर्कहीन । शायद ये संवाद गृहस्थ के लिए नहीं है ये क्षत्रिय के लिए हो। अगर गृहस्थ के लिए होता तो शायद ये संवाद स्वयं पुरषोत्तम राम कर रहे होते। मगर वो स्वयं इसी विवेचना और पारिवारिक संबंधों के विभिन्न स्तरों पर उलझे रहे और मानवीय संवेदनशीलता , अश्रुलिप्त विलाप, आत्मीय सम्बोधन और मिलन और बिछड़ाव के बिच भावनाओं में डूबे रहे। और हमें एक संजीदा जीवन को जीने का आदर्श देते रहे।
शायद तभी मैं ये मानता हूँ की मेरा व्यवहार और भावुक आँशु शायद अर्थहीन तो नहीं है। और इस दर्द का एहसास इतना सहज नहीं है की उसे "स्थितिप्रज्ञ" बन कर सुगम्य बना दिया जाये। सजल नयन और भावुक मन तो आत्मीयता का एहसास मात्र है,। मातृत्व, ममत्व और वात्सल्य का अनंत प्रेम इन गिनती के अश्रुबूंदों से कमजोर तो नहीं होगा बल्कि उसका एहसास और भी सबल होगा और अनंतगामि भी शायद ।
दीवाली की इस दृष्टिहीन अमावस को शायद इन आंशुओं का प्रतिबिम्ब नहीं दिख रहा होगा मगर उसे एहसास तो हो ही गया होगा शायद की उपस्थिति और अनुपस्थिति के बिच का रहस्य और सत्य के साथ सामंजस्यता का मतलब।क्योंकि दीवाली को भी एहसास तो होगा ही की उसका अपना अस्तित्व नहीं है, वो तो हर्ष, उल्लास, अपनापन, उपस्थिति और समाज के बिना गौण है।

शायद तभी दीवाली अपने एहसास के साथ गौण है,  विकल्पहीन और काली भी और हम स्वग्राह्य। मुझे तभी आज उल्लू शान्त और चमगादर सीधा बैठा दिख रहा है।और मैं गुम और एकटक आसमान की ओर उन्हें निहार रहा हूँ। इन अमावस में भी टिमटिमाते देख सकता हूँ उन्हें और मुस्कुराते भी रातभर सजल नयनों से ।

भास्कर

Tuesday, October 17, 2017

संवाद

संवाद होता था और अब भी होगा, अभिव्यक्ति नहीं रुकेगी ! संज्ञान तब भी था, और आज भी है। सवाल अब भी मैं करूँगा, और जवाब भी ढूंढूंगा। काल चिंतन का व्यथा और कालचक्र का परामर्श अब भी गौण रहेगा, सदैव की तरह,वो तब भी हावी थी और अब और भी मुखर होंगी। मैं हारूँगा नहीं , मेरा अस्तित्व का संरचना कालजयी है, और उनके ममत्व का स्पर्श शाश्वत । मैं वैभव के उत्कर्ष को पराभव में परिवर्तित नहीं होने दूंगा। क्योंकि वो यही चाहती थी।
संवाद होता था और अब भी होगा।
संवाद का शब्द और अभिव्यक्ति की श्रृंखलाएँ उन्हें जिवंत रखेगा और मुझे अभिलाषी भी ।मुझे पता है, मेरे अस्तित्व और अनवरत संवाद के स्वर उनको हर्षित करेगा और मुझे  उत्प्रेरित और सजग भी। कल भी संवाद का स्वर एकाकी था और आज भी एकाकी ही होगा बस कल तक स्वर सर्वांगसम था और आज स्वर विषम होगा। मैं कल भी बस अभिव्यक्ति था और स्वर का स्वरुप वही था और अब भी वही होगा लेकिन कल तक स्वर प्रफ्फुलित और आरोही था और अब शब्द खामोश और शून्य होगा।
गोलम्बर की परिधि अब शून्यांकित है और "मैं" रूपी त्रिज्या गौण। मुझे पता है की मेरे गोलम्बर की परिधि का वर्चस्व मेरे केंद्र की उपस्थिति को अब तक महज उपस्थिति मान कर नजरअंदाज करता रहा है , मगर जब आज केंद्र गौण है तो परिधि ही संकुचित हो कर केंद्र बनता जा रहा है। केंद्र से परिधि या परिधि से केंद्र का सत्य  अब मेरे गोलम्बर को वास्तविकता से रु ब रु करवा रहा है। अब मुझे पता चल रहा है की परिधि का अस्तित्व ही केंद्र से है। अब गोलम्बर पहले की तरह उन्मुख तो नहीं रहेगा मगर हाँ संवाद अब भी करेगा।

संवाद पहले भी होता था और अब भी होगा ।।

भास्कर

Monday, October 9, 2017

शितरक्त

"शितरक्त"
छुपा था वो आसमानों में कहीं
आकाशगंगा में या ब्रम्हांड में कहीं
दुविधा थी सजग,कहीं आसमानों में
लहरों में या बादलों में कहीं
कहाँ गुम है वो सजग प्रहरी
यह यक्ष प्रश्न विस्तारित था
हर पल मस्तिष्क और पटल पर कहीं
चल-अचल विश्वास में थे सब
देर और अंधेर की मुहावरों में कहीं
लौट आने में युग की क्यूँ देरी
विशेष और विनिमय का क्यूँ अपेक्षा
पहल तुम्हारी ही है इश्वर
फिर ये सांत्वना और समय का क्यूँ है रेखा
क्या ये चरम विशेषण विषमय की
काफी नहीं
जो अन्याय और विवेक का क्षय और निम्नतर हो ?
कब तक बहुब्रिह समास का सदुपयोग विपदा में हो ?
कब तक हम रहें रक्तमय और अश्रुलिप्त हो ?

अरे निर्णायक ..निर्णय की घड़ी को तीव्र करो अब
जरा आँखे फेरो अब ,मत रहो अब और मुक्दर्शी
छोड़ो निष्ठुरता को, मत बनो तुम भी शितरक्त अब....

भास्कर